अक्सर हम जैसे आम ट्रेडरों का छोटा-मोटा ग्रुप होता है। यह ग्रुप आपसी राय से सौदे करता है। सभी लगभग समान इंडीकेटरों का इस्तेमाल करते हैं। यह समूह में चलने की सहज पशु-वृत्ति है। इसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन समूह के फेर में पड़कर हम मतिभ्रम का शिकार भी हो सकते हैं। फिर, आज इंटरनेट जैसी टेक्नोलॉजी ने सब कुछ इतना व्यवस्थित कर दिया है कि हम अकेले बहुत कुछ कर सकते हैं। अब बुधवार का वार…औरऔर भी

जो लोग भी आपको टिप्स बांटते हैं, चाहे वे ब्रोकर फर्में हों या तथाकथित स्वतंत्र एनालिस्ट, उनसे कभी पूछिए कि इनका आधार क्या है? अगर आधार घोषित/अघोषित खबर है तो यकीन मानिए कि गन्ने का सारा रस निचुड़ जाने के बाद अब खोइया ही बची है। अगर टेक्निकल एनालिसिस है तो वह गुजरे हुए पल के डाटा पर आधारित है। फिर, इसमें तो हज़ारों लोग माहिर हैं तो आप औरों से जीतोगे कैसे! सोचिए। बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी

इधर कुछ दिन दिल्ली में हूं और भांति-भांति के लोगों से मिलना-जुलना चल रहा है। कल शाम फाइनेंस जगत के खास किरदार से मुलाकात हुई। उनका कहना था कि इस बाज़ार में हमारे-आप जैसे रिटेल/आम निवेशकों का कोई भविष्य नहीं। मैंने इधर-उधर की बातें कर उनके अहं का पूरा ख्याल रखा। लेकिन मन ही मन कहा कि अगर हमारा भविष्य नहीं है तो इस देश की अर्थव्यवस्था का भी कोई भविष्य नहीं है। अब बाज़ार की दशा-दिशा…औरऔर भी

हिजरी संवत का पहला महीना, मुहर्रम। इसका दसवां दिन यौमे-आशूरा कर्बला के शहीदों की यादगार में मनाया जाता है। पहले की गणना के हिसाब से यह दिन आज पड़ना था। लेकिन अब यह दिन 15 नवंबर को पड़ रहा है तो ताजिया के जुलूस आज नहीं, कल निकलेंगे। छुट्टी कल है, आज बाज़ार खुला है। वैसे, चंद सदियों में ज़माना कितना बदल गया। रेगिस्तानी मैदानों के युद्ध स्क्रीन तक सिमट गए हैं। अब हफ्ते की आखिरी ट्रेडिंग…औरऔर भी

डॉलर की फांस फिर चुभने लगी है। रुपया गिरने लगा है। लेकिन ज्यादा गिरने की उम्मीद नहीं है क्योंकि इस बार रिजर्व बैंक के पास सिस्टम में डालने के लिए पर्याप्त डॉलर हैं। इस बीच सितंबर में हमारा औद्योगिक उत्पादन 2% बढ़ा है, जबकि अगस्त में यह 0.4% ही बढ़ा था। यह ठीकठाक खबर है। पर अक्टूबर में उपभोक्ता मुद्रास्फीति का उम्मीद से ज्यादा 10.09% बढ़ना बुरी खबर है। क्या होगा इस खबरों का असर, बताएगा बाज़ार…औरऔर भी

फाइनेंस की दुनिया ज्यादा अस्थिर, ज्यादा रिस्की हो चली है। ग्लोबल हरकतें लोकल खबरें बन गई हैं। नेट व चौबीसों घंटे चलते न्यूज़ चैनलों ने सूचनाओं को सर्वसुलभ करा दिया। पर प्रोफेशनल फंड मैनेजर सूचनाओं के आम होने से पहले ही उनका खास इस्तेमाल कर लेते हैं। खबर हम तक पहुंचे, इससे पहले वे उसका रस निकाल लेते है। लेकिन सारी हरकतें जाती हैं भाव में। इसलिए भाव को पकड़ो, भाव पर खेलो। अब देखें बाज़ार मंगल का…औरऔर भी

पहले नौकरी। फिर जूस की दुकान। अब ट्रेडिंग का जुनून सवार है। सारी पोथियां बांच डालीं। चार्ट पर इतने सारे इंडीकेटर चिपकाए कि माथा झन्ना गया। अरे भाई! इतना उलझाव क्यों? जीवन में कठिनतम सवालों के जवाब बड़े आसान हुआ करते हैं। बाज़ार कैसे काम करता है, आगे क्या होनेवाला है, आप सही-सही कभी नहीं जान पाएंगे। ट्रेडिंग में कूदने से पहले इसे गांठ बांध लें। यह गारंटी नहीं, प्रायिकताओं का खेल है। अब रुख सोमवार का…औरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार के रोज़ के औसत टर्नओवर में 2001 से 2013 तक के 12 सालों में आम भारतीय निवेशकों की भागीदारी 89.46% से घटकर 34.31% पर आ चुकी है, जबकि विदेशी निवेशकों का हिस्सा 7.95% से 47.25% पर पहुंच गया। इसी दौरान घरेलू संस्थाओं की भागीदारी 2.59% से 18.44% हो गई। विदेशियों के धन पर यूं बढ़ती निर्भरता देश की सेहत के लिए कतई अच्छी नहीं। आप सोचें इस मुद्दे पर। चलें अब शुक्र की ओर…औरऔर भी

जब लार्जकैप या बड़ी कंपनियों में जमकर खरीद हो चुकी होती है तो उनमें कुछ दिनों के लिए मुनाफावसूली चल निकलती है। ठीक इसी वक्त मिडकैप स्टॉक्स में खरीद बढ़ने लगती है और वे फटाफट उढ़ने लगते हैं। फिलहाल बाज़ार का यही हाल है। लेकिन जैसे ही कोई बुरी खबर आएगी, यही मिडकैप स्टॉक्स बड़ी तेज़ी से गिरेंगे, जबकि लॉर्जकैप या तो संभले रहेंगे या गिरेंगे तो बहुत थोड़ा। इस सावधानी के साथ अब नज़र आज पर…औरऔर भी

दीर्घकालिक निवेश और अल्पकालिक ट्रेडिंग के नीति-नियम अलग-अलग हैं। निवेश को लेकर वॉरेन बफेट का कहना है कि जब बाज़ार में औरों पर लालच हावी हो तो आप डर-डरकर कदम उठाएं और जब औरों पर डर छाया हो तो आप लालची हो जाएं। लेकिन ट्रेडिंग में न्यूनतम रिस्क की नीति कहती है कि जब बाज़ार लालच से पागल हो उठा हो तब आप कभी भी बेचकर या शॉर्ट से कमाने की न सोचें। अब बुधवार का बाज़ार…औरऔर भी