शेयर बाज़ार एक जैसी जगह है कि जहां लंबा/लांग होने से कहीं ज्यादा फायदा छोटा/शॉर्ट होने में है। दरअसल, शॉर्ट सौदे केवल फ्यूचर्स और ऑप्शंस सेगमेंट में शामिल शेयरों में किए जा सकते हैं और वहां लीवरेज़ काफी ज्यादा होता है। कम पूंजी में बड़े सौदे और बड़ा मुनाफा। शेयर एक दिन में 2% गिरा तो आप 20% तक कमा सकते हैं। लेकिन सीधा-सा नियम है कि रिवॉर्ड ज्यादा तो रिस्क भी ज्यादा। अब गुरुवार की बौद्ध-ट्रेडिंग…औरऔर भी

अगर आपको कहीं अंदर से लगता है कि शेयर बाज़ार को सिर्फ बढ़ना ही बढ़ना है तो आप अभी निवेश/ट्रेडिंग के लिए तैयार नहीं हैं। अर्थव्यवस्था में सुस्ती/मंदी भी आएगी और शेयर बाज़ार में गिरावट भी आएगी। यह अकाट्य सत्य है। अगर यह आपके गले नहीं उतरता तो आप यथार्थ नहीं, भ्रम में जी रहे हैं। और, भ्रमों की दुनिया में ख्याली पुलाव पकाए जा सकते हैं, कमाई नहीं की जा सकती। अब बुधवार का ट्रेडिंग बौद्ध-सूत्र…औरऔर भी

अलग-अलग टाइमफ्रेम की ट्रेडिंग के नियम व तनाव अलग हैं। इंट्रा-डे में आपको उस तरह चौकन्ना रहता पड़ता है जैसे आप छह महीने के छोटे बच्चे की देखभाल कर रहे हों। वहीं फ्यूचर्स व ऑप्शंस में आपको दो दिन में सौदा काटकर निकल जाना चाहिए। उसमें भी चौकन्ना रहना बेहद जरूरी है। लेकिन स्विंग व मोमेंटम ट्रेड में कोई खास तनाव नहीं। दिन में जब चाहे सौदा करो। अपने मिजाज के हिसाब से टाइमफ्रेम चुनें। अब आगे…औरऔर भी

छोटे-मोटे शेयरों की बात अलग है। लेकिन पूरे बाज़ार की चाल इस वक्त डॉलर की चाल से जुड़ चुकी है। इस अमेरिकी मुद्रा ने भारत ही, दुनिया भर के बाज़ारों में खरमंडल मचा रखा है। पिछले साल मई से उसका तूफान कुछ ज्यादा ही बढ़ गया। टैपरिंग भयंकर चक्रवात की तरह हर वक्त बाज़ारों के सिर पर मंडराता रहता है। बांड खरीद के घटने-बढ़ने से बाज़ार की सांस उठती-गिरती है। ऐसे में परखते हैं बाज़ार की चाल…औरऔर भी

बाज़ार सोम को गिरा, मंगल को उठा, बुध को जस का तस पड़ा रहा। गुरु को खुला तो बढ़त के साथ। लेकिन अचानक 1.25% का गोता लगातार उठा तो थोड़ी बढ़त लेकर बंद हुआ। बाज़ार आखिर जाना कहां चाहता है? हम नहीं जानते। ट्रेडर को इससे मतलब भी नहीं होना चाहिए। उसका तो मकसद है जो भी दिशा हो, उसे पकड़कर लाभ कमाना। कयासबाज़ी विश्लेषकों के पापी पेट का सवाल है, उसका नहीं। इसलिए पकड़ते हैं दिशा…औरऔर भी

किसी समय रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को शेयर बाज़ार का किंग कहा जाता था। इसके मुखिया धीरूभाई अंबानी के बारे में माना जाता था कि बाज़ार उनके इशारों पर नाचता है। जुलाई 2002 में उनके देहांत के बाद भी माना गया कि बाज़ार में अंबानी भाइयों की तूती बोलती है। लेकिन 2005 से यह स्थिति बदलने लगी। अब बाज़ार में एफआईआई समेत ऐसे खिलाड़ी आ गए हैं जो बाज़ार की दिशा तय करते हैं। इसके मद्देनजर बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी

भारत ही नहीं, दुनिया भर में शेयर, कमोडिटी, फॉरेक्स बाज़ार के तमाम ट्रेडर पिछले भावों का चार्ट देखकर फैसला लेते हैं। लेकिन चार्ट तो सबके लिए समान है, फिर फैसले अलग-अलग क्यों? ऐसी चकरघिन्नी क्यों? एक ही वक्त किसी को मंदी तो किसी को तेज़ी नजर आती है! बात ऐसी भी नहीं कि जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। फर्क है आम तस्वीर के खास संकेतों को पकड़ने का। अब पकड़ें बुध का ट्रेड…औरऔर भी

शेयरों की ट्रेडिंग में या तो आप जीतते हैं या हारते हैं। यहां जीत-हार के बीच की कोई चीज़ नहीं होती। बाज़ार में बहुत-से सौदे न्यौता देकर बुलाते हैं कि आओ! हमें झपटकर ले जाओ। लेकिन ज्यादातर इनके पीछे उस्तादों का फैलाया जाल/ट्रैप होता है जिसमें फंसकर आप अपनी पूंजी गंवा बैठते हैं। दूसरी तरफ कम रिस्क और ज्यादा लाभ के सौदे होते हैं जिन्हें हमें तलाशकर निकालना होता है। काम बड़ा दुश्कर है। बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी

शेयरों के भाव लंबे समय में यकीनन कंपनी के कामकाज और भावी संभावनाओं से तय होते हैं। लेकिन पांच-दस दिन की बात करें तो बड़े खरीदार या विक्रेता उनमें मनचाहा उतार-चढ़ाव ला देते हैं। यह भारत जैसे विकासशील बाज़ार में ही नहीं, अमेरिका जैसे विकसित बाज़ार तक में होता है। इधर एल्गो ट्रेडिंग के बारे में कहा जा रहा है कि उसने भावों का पूरा सिग्नल ही गड़बड़ा दिया है। इन सच्चाइयों के बीच हफ्ते का आगाज़…औरऔर भी

हर निवेशक/ट्रेडर के दो सबसे बड़े दुश्मन हैं उसका अपना अतिविश्वास और भीड़ की मानसिकता। हम ताल ठोंककर मानते हैं कि जितना जान सकते हैं, उससे भी ज्यादा जानते हैं। भीड़ की मानसिकता यह है कि ज्यादातर लोग ऐसा कर रहे हैं तो हमें भी वैसा करना चाहिए। हर किसी में ये दोनों प्रवृत्तियां किसी न किसी मात्रा में होती हैं। लेकिन ये दोनों ही हमारी मेहनत से जुटाई पूंजी को खा जाती हैं। समझिए, बचिए, बढ़िए…औरऔर भी