रिजर्व बैंक ने नए वित्त वर्ष का आगाज़ बड़े सधे अंदाज़ में किया। बैंक जितने ब्याज पर उससे उधार लेते हैं, उस रेपो दर को 0.25% घटाकर 6.5% कर दिया। वहीं, बैंक उसके पास जमाधन पर जितना ब्याज पाते हैं उस रिवर्स रेपो दर को 0.25% बढ़ाकर 6% कर दिया। उसने मनी मार्केट या कॉल मनी बाज़ार की रेंज 1 से घटाकर 0.5% करने की कोशिश की है। नतीजतन, पूंजी की लागत घटेगी। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अर्थशास्त्रियों से लेकर बाज़ार तक ने तय मान रखा है कि आज 11 बजे रिजर्व बैंक रेपो या ब्याज दर 0.25% घटा कर 6.75% से 6.5% कर देगा। साथ में सीआरआर और एसएलआर थोड़ा कम किया जा सकता है ताकि बैंकों के पास कैश की उपलब्धता बढ़ जाए। रिजर्व बैंक ने इतना किया तो बाज़ार सामान्य रहेगा या बिकवाली आ सकती है। इससे ज्यादा हुआ तो बाज़ार चौंककर उछल सकता है। अब मंगलवार की दृष्टि से आगे…औरऔर भी

यह हफ्ता खबरों और उम्मीदों का है। वित्त वर्ष 2016-17 की पहली मौद्रिक नीति मंगलवार को आएगी। पांच राज्यों के चुनाव शुरू हो रहे हैं। इसलिए हम खबरों तक सीमित रहेंगे। लेकिन बड़े से लेकर छोटे शहरों तक आम ट्रेडरों में फैली यह धारणा तोड़नी ज़रूरी है कि कोई दूसरा उन्हें कमाकर दे सकता है। लोगबाग अक्सर पूछते हैं कि इंट्रा-डे में कितना कमाकर दे सकते हो? इस सोच में बुनियादी खोट है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अपने दिलो-दिमाग में कहीं गहरे बैठा लीजिए कि वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग सटीकता का नहीं, प्रायिकता का खेल है। यहां कुछ भी 100% पक्का नहीं। हो सकता है कि किसी शेयर में 80% बढ़ने का चांस हो और कहीं मामला 50-50% पर अटका हो। प्रायिकता का हिसाब ही बता सकेगा कि किसमें बिकवाली के आसार 60% या ज्यादा हैं और कौन-सा शेयर कुछ दिन में रपट सकता है। अब वित्त वर्ष 2016-17 के पहले दिन का अभ्यास…औरऔर भी

जो आपकी भावनाओं के दम पर शिकार करने निकले हैं, उनके शिकार बन गए तो आपका भला कभी नहीं हो सकता। स्टॉक एक्सचेंज जितनी जानकारी दे देते हैं, ट्रेडिंग के लिए उससे ज्यादा सूचना की ज़रूरत कभी नहीं होती। फिर भी बिजनेस चैनलों को सुबह से रात तक छुनछुना बजाना है तो वे कोई न कोई नाटक करते ही रहते हैं। उनके मालिकों व एंकरों के धंधे अलग हैं, डीलिंग-सेटिंग तगड़ी होती है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

कोई भी बिजनेस दिन में सपने देखने से नहीं चलता। उसके लिए सारा कुछ जोड़-घटाकर देखना पड़ता है कि कितनी लागत पर कितनी मुनाफा कमाया जा सकता है। जोखिम है तो कितना और उसे कैसे कम से कम किया जा सकता है। जो मछलियां आसान चारे की लालच में फंसती हैं वे फौरन किसी का शिकार बन जाती हैं। इसलिए उचित होगा कि बाज़ार का स्वभाव समझें और उसके हिसाब से ट्रेड करें। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

जहां लाखों लोगों की भावनाएं चल रही हों, करोड़ों के सौदे पूरा हिसाब-किताब लगाकर किए जा रहे हों, वहां बाज़ार या किसी शेयर के भाव कहां जाएंगे, इसकी सटीक गिनती करना नामुमकिन है। ऐसे में शेखचिल्ली की तरह दिवास्वप्न देखना निरी मूर्खता है कि हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही होगा। कोई दूसरा आपको बताता है कि उसके पास भविष्य में झांकने का पक्का फॉर्मूला है वो आपको उल्लू बना रहा होता है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

जिसे जानना मुश्किल ही नहीं, असंभव है उसे जानने का दावा करना वित्तीय बाज़ार का धंधा बन चुका है। हम सभी सिर उठाए पूछते रहते हैं कि कच्चा तेल कहां तक गिरने के बाद कितना उठेगा? फलानां शेयर कितना और गिर सकता है? बाज़ार कहां पर टॉप बनाएगा और इसका बॉटम क्या है? निवेशकों व ट्रेडरों की इसी मूढ़ता व अतार्किक जिज्ञासा पर तमाम विश्लेषकों और बिजनेस चैनलों का धंधा चलता है। अब देखें सोम का व्योम…औरऔर भी

अमेरिका में पचास लाख करोड़ डॉलर ईमानदार मेहनत और बचत से आए होते तो आज दुनिया के हालात कुछ और ही होते। तब, फेडरल रिजर्व को ब्याज दर को असहज तरीके से शून्य या उसके पास रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पिछले दस सालों में उसकी इस नीति के कारण अमेरिका के बचतकर्ताओं को करीब आठ लाख करोड़ डॉलर गंवाने पड़े हैं। ऊपर से सस्ता अमेरिकी धन वैश्विक बाजारों को फुलाए पड़ा है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

आज की ग्लोबल दुनिया में भारत जैसे बाज़ार अमेरिका, यूरोप, जापान व चीन के हालात से खूब प्रभावित होते हैं। फेडरल रिजर्व ने तय किया कि ब्याज दरों को सामान्य स्तर पर लाने में हड़बड़ी नहीं बतरेगा तो डाउ जोन्स सूचकांक दो दिन में 1.6% उछल गया जबकि अमेरिकी कंपनियों का लाभ तीन तिमाहियों से घट रहा है और औसत अमेरिकी परिवार की आय दस साल पहले से भी कम है। अब नज़र सोमवार के व्योम पर…औरऔर भी