एक बात हमेशा गांठ बांधकर चलनी चाहिए कि बाज़ार में हम से ज्यादा मजबूत हज़ारों खिलाड़ी हैं। कौन क्या सोच पकड़ेगा, हमें नहीं पता। हमने जितने कारक गिने हैं, उसके अलावा बहुत से कारक हो सकते हैं जिन पर हमारा ध्यान न गया हो। इतने अनजान पहलुओं के बीच हमारे अतिविश्वास का कोई फायदा नहीं। इसलिए हर सौदे में गिनकर चलना चाहिए कि दांव उल्टा पड़ जाए तो मार को न्यूनतम कैसे रखेंगे। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

बाज़ार का हम कुछ बिगाड़ नहीं सकते। लेकिन कोई स्टॉक हमारे माफिक नहीं चलता तो गुस्से में भरकर उसे खरीद या बेच डालते हैं। मेरे गांव के विश्राम सिंह तहसील जा रहे थे मुकदमा लड़ने। साइकिल की चेन बार-बार उतर जा रही थी तो लेट होता जा रहा था। तहसील के पास पुलिया की चढ़ाई पर फिर चेन उतर गई तो मार-लाठी, मार-लाठी साइकिल को ही धुन डाला। मुकदमे की तारीख छूट गई। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

कभी भी उधार के धन से ट्रेडिंग न करें। इसी नियम का हिस्सा है कि ब्रोकर कितना भी उकसाए, मार्जिन ट्रेडिंग कतई न करें। इससे आप दोहरे दबाव में आ जाते हैं। एक तो बाज़ार की अनिश्चितता। दूसरे, कर्ज़ पर ब्याज और समय पर अदायगी। ऐसे दबाव में 99.99% आशंका इस बात की है कि आप ट्रेडिंग का फैसला शांत व संतुलित दिमाग से नहीं ले पाएंगे तो पक्का पिट जाएंगे। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हमारी सबसे बड़ी गलती यह है कि दूसरों की छोड़िए, हम अपनी गलतियों तक से नहीं सीखते। हां, पछताने की भयंकर आदत हमने ज़रूर डाल रखी है। काश! मन में आई बात पर ट्रेड करते तो इस स्टॉक के 10% उछलने का फायदा मिल गया होता। काश! स्टॉप-लॉस पकड़कर चलता तो दो लाख रुपए डूबने से बच जाते। बंधुवर, असल दिक्कत यह है कि आपको रिस्क लेने और संभालने का सलीका नहीं आता। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

उगते सूरज को सभी सलाम करते हैं और गिरे हुए इंसान को हर कोई लात मारता है। यह समाज की आम मानसिकता है। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में यही बात यूं कही जाती है कि हमेशा ट्रेन्ड की दिशा में ही ट्रेड करना चाहिए। लेकिन बाज़ार में असली कमाई वो करते हैं जो ट्रेड वहां पकड़ते हैं, जहां से ट्रेन्ड बदलता है। ट्रेन्ड बदलने का काम संस्थाएं या पारखी निवेशक करते हैं। अब आजमाएं बुधवार की बुदधि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में एक का नुकसान दूसरे का फायदा होता है। इसलिए यहां अक्सर लोग जो कहते हैं, वैसा नहीं, बल्कि उसका उल्टा करते हैं। एक ही ब्रोकरेज या रिसर्च फर्म वही स्टॉक रिटेल निवेशकों को बेचने को कहती है, जबकि संस्थागत निवेशकों को खरीदने को। जाहिर है, उस्ताद लोग असल में क्या कर रहे है, इसकी भनक नहीं लग सकती। इसलिए कभी कही या सुनी बातों पर यकीन न करें। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

कंपनियों के शेयरों में किया गया निवेश उसकी लाभप्रदता के साथ बढ़ता है। दूसरी तरफ शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में कमाई तब होती है, जब दूसरा गंवाता है। इसमें लालच और डर का खेल चलता है। वही ट्रेडर कमाता है जो दूसरों की लालच या डर का फायदा उठाता है। अगर हम खुद ही लालच/डर की फांस में फंस गए तो तय समझें कि हमारे खाते का धन दूसरा निगल जाएगा। अब परखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार के निवेशक आम ग्राहक की तरह है जो काम की चीज़े खरीदकर अपने मूल काम-धंधे में लग जाते हैं और अगली बार ज़रूरत पड़ने पर ही फिर बाज़ार का रुख करते हैं। लेकिन ट्रेडर का तो काम-धंधा ही शेयर बाज़ार से चलता है। उसे नियमित अंतराल पर बाज़ार का चक्कर लगाना पड़ता है। इसलिए उसकी मानसिकता अलग होती है और उससे ज्यादा चौंकन्नापन बरतने की अपेक्षा की जाती है। अब करते हैं शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

प्याज़ सस्ता बिके या महंगा, व्यापारी को फर्क नहीं पड़ता। उसका काम थोक में माल खरीदकर रिटेल में बेचना है। इस तरह ज्यादा नहीं, थोड़े-थोड़े मार्जिन को जोड़कर वो मज़े में कमा लेता है। लेकिन शेयर बाज़ार के ट्रेडर अपनी सीमाएं भूलकर खुद को मालिक या रिटेल ग्राहक बना डालते हैं तो बराबर मुंह की खाते हैं। वे सामान्य व्यापारी हैं, इस हकीकत को याद रखें तो मंदी या तेज़ी में भी कमाएंगे। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

लोकतंत्र में चुनावों का बड़ा महत्व है। लेकिन चुनाव पांच-साला अनुष्ठान हैं तो मतदाता पुरानी बातें भुलाकर नए वादों के जाल में फंस जाता है। सत्तापक्ष को वादे न पूरा करने की भरपूर कीमत ज़रूर चुकानी पड़ती है, लेकिन लोग विपक्ष की कारगुजारियां भूलकर उसके नए वादों के झांसे में पड़ जाते है। मगर, बाज़ार का चक्र हर दिन और सप्ताह का होता है तो यहां झूठ की कलई उतरते देर नहीं लगती। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी