अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अहम सालाना अनुष्ठान आज संपन्न होने जा रहा है। सबकी निगाहें कम से कम दोपहर दो बजे तक टीवी पर चिपकी रहेंगी कि वित्त मंत्री क्या-क्या घोषणा करने जा रहे हैं। बाज़ार की सांस उसी हिसाब से ऊपर-नीचे होती रहेगी। फिलहाल माहौल में उम्मीदों के बजाय निराशा का पुट ज्यादा दिख रहा है। ऐसे में ज़रा-सी खबर बड़ी हलचल का सबब बन सकती है। ट्रेडिंग में खतरा ज्यादा है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बाज़ार चाहता है कि अर्थव्यवस्था को विकास अच्छी रफ्तार से हो। लोगों के पास ज्यादा खर्च करने की क्षमता हो। इसलिए इनकम टैक्स में छूट की सीमा ढाई से बढ़ाकर कम से कम चार लाख कर दी जाए। लेकिन अगर कैपिटल गेन्स टैक्स से कोई नकारात्मक छेड़छाड़ की गई, सिक्यूरिटीज़ ट्रांजैक्शन टैक्स बढ़ाया गया तो बाजार नाराजगी भी जता सकता है। लेकिन मोदी सरकार के लिए साहसिक सुधार का यह आखिरी बजट है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

यह अर्थव्यवस्था को प्रभावित करनेवाली बड़ी नीतियों का हफ्ता है। कल से संसद का बजट सत्र शुरू हो रहा है। पहले दिन आर्थिक समीक्षा पेश की जाएगी। उसके अगले दिन, 1 फरवरी को वित्त मंत्री अरुण जेटली अपना तीसरा बजट पेश करेंगे। वे बजट में विदेशी निवेशकों को नाराज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकते। लेकिन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से चंद दिन पहले मतदाता को भी कतई हैरान-परेशान नहीं करेंगे। अब परखें सोम का व्योम…औरऔर भी

गणतंत्र दिवस बीत गया। राजधानी दिल्ली में समूचे भारत की सांस्कृतिक झांकियों से लेकर सामरिक शक्ति का प्रदर्शन भी हुआ। लेकिन हम एक बात भूल जाते हैं कि गणतंत्र में जितनी अहम भूमिका आमजन की है, उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका बाज़ार की है। सरकार या चंद व्यक्ति बाज़ार को अपनी उंगलियों पर नचाने लग जाएं तो आम नहीं, खासजन की मौज हो जाती है और गणतंत्र उसी पल दम तोड़ने लगता है। अब करें शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

गणतंत्र अपनी मूल भावना के साथ काम करे और निर्वाचित प्रतिनिधि बेलगाम न हो जाएं, इसके लिए संविधान बनाया जाता है। हर मसले पर जबरस्त बहस के बाद संविधान बनाया जाता है। फिर भी कुछ मसले छूट या नए मुद्दे सामने आ जाएं तो संविधान में संशोधन का अधिकार संसद के पास होता है। साथ ही न्यायपालिका संविधान की रक्षा का काम करती है। यह सैद्धांतिक व्यवस्था है। लेकिन व्यवहार क्या है? अब आजमाएं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

चुने हुए प्रतिनिधियों की सरकार गणतंत्र की ऊपरी अवधारणा है। मूल है सत्ता की लगाम आमजन के हाथों में होना जो निश्चित अंतराल, जैसे भारत में पांच साल पर वोट से पहले चुने गए प्रतिनिधियों को हटा सकता है। लेकिन दो चुनावों के बीच के पांच सालों में आमजन असहाय रहता है और तब उसके वोटों से जीते प्रतिनिधि ही उसके माई-बाप बन जाते हैं। उन्हें ‘वापस बुलाने का अधिकार’ मिलना ज़रूरी है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

देश इस हफ्ते 67वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। 26 जनवरी गुरुवार को पड़ रही है, इसलिए जनवरी के डेरिवेटिव सौदों की एक्सपायरी इस बार एक दिन पहले बुधवार, 25 जनवरी को होगी। यह बाज़ार की तकनीकी बात है। पर इस बहाने हमें गणतंत्र की मूल भावना को आत्मसात करने की कोशिश कर लेनी चाहिए। गणतंत्र में सत्ता किसी एक व्यक्ति नहीं, बल्कि आम लोगों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथ में होती है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में केवल चार संभावनाएं होती हैं: बड़ी जीत, छोटी जीत, छोटा घाटा और बड़ा घाटा। अगर कोई ट्रेडर बड़े घाटे से बचता रहे तो बाकी तीन स्थितियों में पूरी तरह सही-सलामत रहता है। उसकी ट्रेडिंग पूंजी सलामत रहती है और वो अपने सिस्टम व अनुशासन के बल पर ज्यादा नहीं तो बराबर थोड़ा-बहुत मुनाफा कमाता रहता है। अच्छे रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात वाले सौदे चुने तो उसका मुनाफा बढ़ जाता है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

मानकर चलें कि वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में घाटे से कभी नहीं बचा जा सकता। लेकिन हम उसे कम से कम ज़रूर रख सकते हैं। इसके लिए रिस्क को न्यूनतम करना होता है। प्रोफेशनल ट्रेडर ऐसा करने के वास्ते स्टॉप-लॉस ही नहीं,  पोजिशन साइज़िंग जैसे कई तरीके अपनाते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वे न तो घाटे से विचलित होते हैं और न मुनाफा कमाने पर कुलांचे भरते हैं। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

इंसान होने के नाते हमारा सहज स्वभाव है कि हम हमेशा सही होना चाहते हैं और गलत होने से नफरत करते हैं। लेकिन ट्रेडिंग और निवेश की दुनिया में यह सहज स्वभाव नहीं चलता क्योंकि इसमें गलत होना और घाटा लगना पक्का है। सबसे अच्छे ट्रेडर भी समय-समय पर घाटा खाते रहते हैं। सामान्य ट्रेडर और उनमें अंतर बस इतना है कि वे घाटे को न्यूनतम और मुनाफे को अधिकतम रखना जानते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी