मिर्ज़ा गालिब कितना भी कहते फिरें कि रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल, जो आंख ही से न टपका तो लहू क्या है। लेकिन लहू बहना छोड़कर टपकने या जमने लगे तो इंसान लहूलुहान होकर इस दुनिया तक को अलविदा कह सकता है। इसी तरह लक्ष्मी पर भले ही चंचला कहकर कितनी भी तोहमत लगाई जाए, लेकिन धन का बहना रुक जाए तो अर्थव्यवस्था तबाह हो सकती है। अब दीपावली के सप्ताह की पहली ट्रेडिंग…औरऔर भी

अटल सत्य है कि शेयर बाज़ार के निवेश व ट्रेडिंग में भारी रिस्क है। इसे कोई मंत्र-तंत्र, विद्या या भगवान भी नहीं पलट सकता। हम अधिक से अधिक यही कर सकते हैं कि न्यूनतम रिस्क में अधिकतम रिटर्न की राह निकालें। बेंजामिन ग्राहम से लेकर वॉरेन बफेट जैसे सफलतम निवेशक और जॉर्ज सोरोस जैसे ट्रेडर यही करते रहे हैं। उन्हें भी नुकसान झेलना पड़ा है। लेकिन वे हमेशा अपनी पूंजी बचाकर चलते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बिजनेस चैनलों पर आने वाले एनालिस्टों का तो धंधा ही है हांकना और ऐसे दावे करना कि बाज़ार ठीकठाक कहां और किधर जाएगा। उन्हें इसी बात के नोट मिलते हैं। लेकिन हमारे आसपास ऐसे निवेशकों, ट्रेडरों व गुरुओं की कोई कमी नहीं जो सोशल मीडिया के साथ-साथ कहीं भी मिलने-मिलाने पर दावा करते हैं कि उन्हें बाज़ार की सटीक चाल पता है। उनका यह आत्मविश्वास अपने साथ औरों को भी डुबा डालता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

कहते हैं बिना डूबे मोती और बगैर तकलीफ उठाए सुख नहीं मिलता। अंग्रेज़ी में यही बात ‘नो पेन, नो गेन’ के रूप में कही जाती है। लेकिन इस कहावत के बल पर रिस्क लेने को ललकारनेवाले यह नहीं बताते कि ‘पेन’ हमेशा ‘गेन’ से कम होना चाहिए। अन्यथा, पीड़ा व तकलीफ हमें इसकदर तोड़ डालती है कि उठना दूभर हो जाता है। वित्तीय बाज़ार के ट्रेडर को यह सीमा हमेशा याद रखनी चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

इस समय बाज़ार पर नकदी के संकट का डर छाया हुआ है। इससे गैर-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) और बैंकों के ही नहीं, इन्फोसिस जैसी आईटी कंपनी तक के शेयरों में बिकवाली चल पड़ी है। चूंकि नकदी के संकट में संस्थाओं को फौरन कैश चाहिए तो उनके लिए खूब चलते मजबूत स्टॉक्स से मुनाफा निकालना सबसे आसान होता है। इस तरह बाज़ार की भगदड़ मुनाफा कमा रही कंपनियों को भी बहा ले जाती है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार अचंभों से भरा हुआ है। जो आप कभी सोच नहीं सकते हो, वही अचानक हो जाता है। तब सारे के सारे नियम, सारी की सारी गणनाएं धरी रह जाती हैं। फंडामेंटल या टेक्निकल, कोई एनालिसिस नहीं काम आती। कभी नोटबंदी जैसा बड़ा कदम शेयर बाज़ार का कुछ बिगाड़ नहीं पाता तो कभी आईएल एंड एफएस का छोटा-सा डिफॉल्ट भी बड़ी गिरावट शुरू कर देता है। ट्रेडरों को यह समझ लेना चाहिए। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

आज के दौर में समझदारी इसी में है कि जब तक शेयर बाज़ार की हालत सामान्य नहीं होती, और इसमें छह से आठ महीने भी लग सकते हैं, तब तक रिटेल ट्रेडर ट्रेडिंग छोड़कर दीर्घकालिक निवेशक बन जाएं और एक-दो साल तक का निवेश करें। निवेश करने लायक मजबूत कंपनियां इस समय कम नहीं हैं। इनमें स्टॉप-लॉस की ज़रूरत नहीं। एक स्तर के बाद जितना गिरे, खरीदकर औसत लागत कम कर लेनी चाहिए। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बहुतेरे लोगों को हाइटाइड में सर्फिंग करने में आनंद आता है। शेयर बाज़ार में भी ज्यादा उतार-चढ़ाव होने पर कुछ ट्रेडर इंट्रा-डे से लेकर दो-चार दिन में हज़ारों पीट डालते हैं। हाल-फिलहाल तो हज़ारों ट्रेडर निफ्टी ऑप्शंस में ट्रेडिंग के अभ्यस्त हो चुके हैं और एक दिन में 20-25% से ज्यादा कमा लेते हैं। लेकिन ध्यान रहे, ये लोग या तो बहुत ज्यादा पूंजीवाले होते हैं या अभ्यास से उस्ताद बन चुके हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग खुद में सबसे ज्यादा रिस्की है। लेकिन रिस्क को साधने के लिए लचीलापन बरतना ज़रूरी है। हर परिस्थिति में एक जैसा दांव काम नहीं आता। मसलन, इस समय बाज़ार में चंचलता बहुत बढ़ी हुई है। मारकाट मची है। ऐसे में ट्रेडिंग बहुत खतरनाक है। लेकिन इस तूफान में बहुत सारी अच्छी कंपनियों के शेयर ज़मीन पर आ गिरे हैं तो उनमें लंबा निवेश लाभकारी हो सकता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अभी रिस्क व अनिश्चितता यकीनन बहुत है। पर इससे दूर क्यों भागना! आखिर रिस्क लेंगे तभी तो रिटर्न कमा पाएंगे। बाज़ार का पुख्ता और सीधा-सा नियम है कि आप जितना ज्यादा रिस्क लेंगे, उतना ही ज्यादा रिटर्न हासिल करेंगे। हमारा कहना है कि रिस्क लेने में कोई हर्ज नहीं। लेकिन यह रिस्क सुविचारित और अपनी सामर्थ्य के अनुरूप होना चाहिए। शेर से लड़ने जैसे रिस्क से क्या फायदा, जिसमें जान जानी तय है! अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी