निवेशकों या ट्रेडरों को अगर लगता है कि शेयर बाज़ार में रिस्क बढ़ रहा है और गिरावट की आशंका ज्यादा है तो वे रिस्क से बचने के लिए पुट ऑप्शन खरीदते हैं जिसमें उन्हें अपने शेयर पहले से तय तारीख और भाव पर बेचने का अधिकार मिला रहता है। ये सौदे अमूमन महीने भर में एक्सपायर हो जाते हैं। ऑप्शन सौदे उनकी होल्डिंग के लिए किसी बीमा पॉलिसी की तरह काम करते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की लहरों के ज़ोर व रुझान को पकड़ने के लिए ट्रेडर कई संकेतकों का इस्तेमाल करते हैं। कुछ ट्रेडर निफ्टी के स्प्रेड या दायरे को महत्व देते हैं। लेकिन बैकों, संस्थाओं व प्रोफेशनल ट्रेडरों के बीच सबसे खास व अहम संकेतक है वोलैटिलिटी इंडेक्स या इंडिया वीआईएक्स। यह सूचकांक निफ्टी-50 के ऑप्शंस (पुट और कॉल) में निहित चंचलता को नापता है। इसे बाज़ार में छाए डर का पैमाना भी मानते हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार में छोटे-बड़े जो भी निवेशक या ट्रेडर भाग लेते हैं, उनके पास थोड़ी-बहुत मात्रा में शेयर ज़रूर होते हैं। इसलिए बाज़ार में जब डर छाता है और बिकवाली चलने लगती है, तब हर कोई अपने शेयर बेचकर निकल लेना चाहता है। उस दौरान बहुत ही कम लोग होते हैं जो खरीदने का जोखिम उठाते हैं। बेचने की आतुरता ज्यादा और खरीदने की लालच बेहद कम। सप्लाई ज्यादा, मांग कम। नतीजा भारी गिरावट। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

आमतौर पर शेयर बाज़ार धीरे-धीरे ऊपर उठता है। बढ़त के दौरान उतना ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं होता। लेकिन गिरते वक्त उसकी रफ्तार कहीं ज्यादा होती है। अध्ययन बताते हैं कि बाज़ार जिस गति से बढ़ता है, उसकी तीन गुना गति से गिरता है। इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला, डर की भावना लालच की बनिस्बत कहीं ज्यादा ताकतवर होती है। दूसरा कारण यह कि बाज़ार में खरीदने की तुलना में बेचना आसान होता है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार और अलग-अलग शेयरों के भाव लहरों में चलते हैं। फिर, इन लहरों की तीन चाल होती है। ऊपर, नीचे या सीमित दायरे में भटकती कमोबेश सीधी रेखा। ट्रेडिंग में बाज़ार की इसी स्वभाव से कमाया जाता है। लहर के निचले स्तर पर खरीदना, ऊपरी स्तर पर बेचना। शॉर्ट-सेलिंग में इसका उल्टा। समय का कोई भी फ्रेम चुने, एक दिन, कई दिन, सप्ताह या महीने। ट्रेडिंग से कमाने का यही सलीका है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाजार की बुनियादी संरचना ही ऐसी है कि वह हमेशा लंबे समय में ऊपर जाता है। खासकर भारत जैसे संभावनाओं से भरे विकासशील देश के लिए तो यह अमिट सच्चाई है। सबको डर है कि अगर मोदी सरकार मई में लोकसभी चुनाव जीतकर दोबारा नहीं लौटी तो शेयर बाज़ार पटरा हो जाएगा। हो सकता है कि ऐसा होने पर बाज़ार को हफ्ते-दस दिन का झटका लगे, लेकिन वह फिर कुलांचे मारने लगेगा। अब शुक्रवार अभ्यास…और भीऔर भी

बाज़ार का स्वभाव बड़ा विचित्र है। जब तमाम मूलभूत कारक बता रहे होते हैं कि कोई स्टॉक या पूरा शेयर बाजार उठने जा रहा है, तभी वह अचानक डूब जाता है। यहां हर गणना फेल है। बाज़ार का यह मनमानापन समझने के लिए हर ट्रेडर को नासिम निकोलस तालेब की किताब ‘ब्लैक स्वान’ ज़रूर पड़नी चाहिए। तालेब ने वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग के दशकों के गहरे अनुभव को निचोड़कर यह किताब लिखी है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…और भीऔर भी

बाज़ार का सच कैसे जानें, यह कठिन-कठोर चुनौती है जिसे हर किसी को अपनी लगन व मेहनत से सुलझाना होता है। नौकरी व बिजनेस में धन कमाना उतना कठिन नहीं है, जितना नोट से नोट बनाना जैसा कि हमें शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में करना होता है। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग बहुत ही ज्यादा रिस्की है। इसमें पुख्ता तैयारी के बिना उतरना आत्मघाती साबित होता है। बाज़ार नौसिखिया लोगों को जमकर पीटता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

हमें अगर ट्रेडिंग व निवेश से कमाना है तो सारा ज़ोर यह सीखने-समझने पर लगाना चाहिए कि शेयर बाज़ार कैसे काम करता है और वो अभी कौन-से संकेत फेंक रहा है। इसका अंतिम सूत्र हमें ही निकालना होता है। बिजनेस अखबार, चैनल या इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री में शोर व थोथापन बहुत होता है, जबकि सार न के बराबर क्योंकि आम निवेशकों को सच बताना उनके बिजनेस मॉडल के केंद्र में नहीं है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

आपको क्या लगता है, बड़े-बड़े दिग्गज क्या बोलते हैं या कोई भी क्या महसूस करता है, शेयर बाज़ार इसकी कतई परवाह नहीं करता। इसलिए हमें कभी भी बाज़ार में अपना अगला कदम तय करते वक्त किसी की बात या अपनी भावना के बजाय ज़मीनी हकीकत को समझने की कोशिश करनी चाहिए। बाज़ार के अचानक गिर जाने की चिंता करना एकदम फालतू है। इस चिंता से ट्रेडिंग या निवेश में कोई मदद नहीं मिलती। अब सोम का व्योम…औरऔर भी