अमेरिकी चुनावों का विश्व बाज़ार के साथ-साथ भारतीय बाज़ार पर कुछ न कुछ असर तो पड़ना ही है। लेकिन खुद हमारे बाज़ार को अभी प्रभावित करनेवाले कारक क्या हैं? जून तिमाही का अंत आने के साथ ही इधर म्यूचुअल फंडों ने बाज़ार में ज्यादा खरीद की है क्योंकि उन्हें अपना तिमाही एनएवी चमकाकर दिखाना था। अगर ऐसा न हुआ होता तो हमारा बाज़ार ज्यादा गिर गया होता। फिलहाल, वह दबाव मिट गया है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव वित्तीय बाज़ारों पर जादुई असर डालते हैं। पांच महीने बाद 3 नवंबर को इस बार के चुनाव होने हैं। आमतौर पर इसके नजदीक आते ही शेयर बाज़ार बढ़ने लगता है, ब्याज दरें घट जाती हैं, मुद्रास्फीति में कमी आ जाती है। यहां तक के अमेरिका में बेरोजगारी की दर घटने लगती है। लेकिन इस बार कोरोना ने सारा समीकरण गड़बड़ा दिया है तो देखते हैं वास्तव में क्या होगा। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

हमेशा-हमेशा के लिए गांठ बांध लें कि शेयर बाज़ार में कुछ भी अकारण नहीं होता और यह भी कि आज हमारा शेयर बाज़ार पूरी तरह लोकल से ग्लोबल हो चुका है। साथ ही नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका का वित्तीय बाज़ार दुनिया में सबसे बड़ा है। वहां कुछ भी होता है तो उसका असर सारी दुनिया के बाज़ारों पर पड़ता है। ठीक वैसा ही असर पड़े, ज़रूरी नहीं। लेकिन असर पड़ता ज़रूर है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

चौंकना अच्छी बात है क्योंकि यह हमारी जिज्ञासा को धार देता है। लेकिन जब हम क्रिया या कार्य के पीछे के कारणों को जानने लगते हैं, तब उतना नहीं चौंकते। वित्तीय बाज़ार का भी यही हाल है। बाकी दुनिया की तरह यहां भी कुछ अकारण नहीं होता। कारण नहीं जानते तो हम ऐसा क्यों, वैसा कैसे सोच-सोचकर उछलते रहते हैं। कारण जान जाते हैं तो शांति से ट्रेडिंग या निवेश करने लगते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

कोरोना महामारी का कसता फंदा। अर्थव्यवस्था की डूबती नब्ज़। चीन के साथ सीमा पर बढ़ता तनाव। फिर भी शेयर बाज़ार में तेज़ी। शेयर बाज़ार की गति का अपना ही गणित है। वह बाहरी गणनाओं और हमारी भावनाओं या विचारों की परवाह नहीं करता। वह उधर ही भागता है, जहां मुनाफा कमा सकता है। बाज़ार में उन लोगों की आत्मा को काया मिलती है जिन्हें धन की नहीं, उसे बढ़ाते जाने की चिंता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार को लेकर हमारे रिटेल निवेशकों में इस समय उन्माद-सा छाया हुआ है। कोरोना से ग्रसित दुनिया के शीर्ष 12 देशों में केवल भारत में नए मामले आते जा रहे हैं। हम फिलहाल चौथे नंबर पर हैं। जल्दी ही रूस और ब्राज़ील को पीछे छोड़कर अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर आ सकते हैं। फिर भी शेयर बाज़ार में सक्रिय रिटेल निवेशकों की संख्या साल 2007 जैसी ऊंचाई पर पहुंच गई है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

म्यूचुअल फंडों में आम निवेशकों का ही धन लगा है। जो लोग सीधे शेयर बाज़ार में निवेश करने के झंझट/रिस्क से बचना चाहते हैं, वे म्यूचुअल फंडों का रास्ता अपनाते हैं। इसलिए म्यूचुअल फंडों को कम से कम जोखिम उठाना चाहिए। लेकिन हमारे फंड भी गजब हैं! कोरोना संकट में, जब विदेशी निवेशक भाग रहे थे, तब इन फंडों ने लिस्टेड कंपनियों में अपना निवेश बढ़ाकर 7.97% के सर्वोच्च स्तर तक पहुंचा दिया। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

दस दिन पहले तक लग रहा था कि कोरोना की महामारी और अर्थव्यवस्था की डूबती नब्ज अपने साथ शेयर बाज़ार को डुबा ले जाएगी। लेकिन अब तो शेयर बाजार फिर से बम-बम करने लगा है। एक तरफ अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक तलहटी पर पहुचती दिख रही है, दूसरी तरफ शेयर बाज़ार ऐतिहासिक चोटी से महज 20% दूर है। मगर याद रहे कि यह किसी आशा नहीं, बल्कि मुनाफा खोजने निकले मुक्त धन का प्रताप है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में वोलैटिलिटी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। निफ्टी जहां फरवरी में इंट्रा-डे ज्यादातर 80-100 अंकों के दायरे में भटकता था, वहीं अब उसका दायरा 200 अंकों से ज्यादा हो गया है। दायरा दोगुना तो पूंजी डूबने का जोखिम भी दोगुना। कहने में अच्छा लगता है कि पहले जहां किसी चलते शेयर से पांच दिन में 5% कमा पाते, वहीं अब एक दिन में इतना कमा सकते हैं। लेकिन पूंजी डूबी तो? अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

समुद्र में हाई टाइड आता है तो आम लोगों को समुद्र तट से दूर रहने की सलाह दी जाती है। शेयर बाज़ार में हाई टाइड जैसी अवस्था वोलैटिलिटी के ज्यादा बढ़ने पर आती है। वोलैटिलिटी के लिए हिंदी में कोई शब्द है नहीं। चंचलता कहने से इसकी धार हल्की पड़ जाती है। अफरातफरी या घबराहट इसे कह नहीं सकते। सांख्यिकी में इसकी गणना भावों के उतार-चढ़ाव का स्टैंडर्ड डेविएशन निकालकर की जाती है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी