अपने शेयर बाज़ार के बारे में खास जानने की बात है कि यहां देशी निवेशक संस्थाएं हमेशा रक्षात्मक रहती हैं। वे कभी-कभार ही आक्रामक होती हैं। दूसरी तरफ विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक या विदेशी निवेशक संस्थाएं हमेशा ही आक्रामक रहती हैं। ये एफआईआई आज हमारे बाज़ार की दशा-दिशा तय करने के सबसे अहम कारक हैं। उनके डॉलर आने से बाज़ार चढ़ता है। इससे रुपया मजबूत होता है तो वे ज्यादा डॉलर कमा लेते हैं। अब बुद्ध की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में खरीदनेवाले कौन हैं, इससे भी बहुत फर्क पड़ता है। रिटेल की खरीद समुंदर में एक लोटा या बाल्टी पानी के बराबर होती है। सौ सुनार की, एक लोहार की। बाज़ार में बल्क/ब्लॉक खरीद तो जगजाहिर हो जाती है और वह खटाक से एक-दो दिन में निपट जाती है। लेकिन इनसे अलग प्रोफेशनल व सस्थागत निवेशकों की खरीद होती है जो खास दिशा पकड़कर बराबर चलती है। इसकी परख ज़रूरी है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

यूं तो हर दिन बाज़ार में खरीदे और बेचे गए शेयरों की संख्या बराबर होती है। लेकिन खरीदने और बेचनवालों की संख्या भिन्न हो सकती है। इसमें भी अगर खरीदने का जोर ज्यादा तो शेयर के भाव बढ़ते हैं और बेचने का ज़ोर ज्यादा तो शेयर गिरते हैं। खरीदनेवालों की ज़मात किस दिन, किस ओर मुड़ जाए, पहले से इसका कोई पता नहीं रहता। वे ज्यादा मुनाफे के मौके सूंघते फिरते रहते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

निवेशकों की नई लहर आती रहती है। इस वक्त नौकरीपेशा लोग, खासकर आईटी क्षेत्र के बंदे वर्क-टू-होम के दौरान बड़ी तेज़ी से शेयर बाज़ार की तरफ उमड़े हैं। लेकिन हो सकता है कि अक्टूबर-नवंबर में कोरोना का दूसरा झटका लगने के बाद ये सभी गायब हो जाएं। पिछले घोटालों ने निवेशकों की लहरें सोख लीं। अब बाज़ार का कड़वा सच ताज़ा लहर को ले डूबेगा। बचे रह जाएंगे वही ढाक के तीन पात। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

नब्बे के दशक में छोटे दुकानदार व बेरोजगार शेयर बाज़ार में झूमकर उतरे थे। हर्षद मेहता की कलाकारी में उन्होंने धन भी खूब कमाया। लेकिन हर्षद मेहता का भांडा फूटते ही उनकी सारी कमाई स्वाहा हो गई। वे ऐसे बरबाद हुए कि दोबारा शेयर बाज़ार का रुख नहीं किया। उसके कुछ साल बाद पब्लिक इश्यू का जुनून चढ़ा। तब कुकुरमुत्तों की तरह उगी हज़ारों कंपनियां मासूम निवेशकों से करोड़ों जुटाकर चम्पत हो गईं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

कहने को अपने यहां निवेशक संरक्षण कोष हैं। ये कोष स्टॉक एक्सचेंजों के पास हैं। साथ ही कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय के अधीन अलग से निवेशक शिक्षा व संरक्षण कोष बना हुआ है। मगर सच्चाई यह है कि शेयर बाज़ार का मारा निवेशक सेबी और स्टॉक एक्सचेजों के दरवाजों पर सिर पटकता रह जाता है। यही वजह है कि तीन दशकों से निजी निवेशकों की संख्या आबादी के लगभग 2% पर अटकी पड़ी है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार ऐसी जगह है कि जहां 95% निवेशक/ट्रेडर हंसते हुए आते और रोते हुए निकलते हैं। कारण यह कि वे रिस्क को कायदे से समझे बिना लालच में आकर बाज़ार में कूदते हैं। ऊपर से अपने यहां निवेशकों के संरक्षण की प्रणाली बहुत पुख्ता नहीं है। डीमैट खाता खुलवाते वक्त ही ब्रोकर निवेशकों के हस्तक्षर से उनकी पावर ऑफ अटार्नी ले लेते हैं। फिर ब्रोकरेज़ की खातिर उनके लाखों उड़ा डालते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी बराबर प्रयासरत है कि ब्रोकरों के ‘अन्याय’ से निवेशकों व ट्रेडरों को बचा लिया जाए। इसी क्रम में वह, कल 1 सितंबर से मार्जिन ट्रेडिंग संबंधी नए नियम लागू कर रही है। अभी तक ब्रोकर निवेशक के 70-80% शेयर अपने पास बतौर मार्जिन रख लेते थे। लेकिन अब शेयर निवेशक के डीमैट खाते में ही रहेंगे और मार्जिन ट्रेडिंग के लिए उन्हें ब्रोकर के पास गिरवी रखना पड़ेगा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में नई भीड़ तब आई है, जब पिछले 3 साल में जितने व जिस तरह ब्रोकरों ने डिफॉल्ट किया है, वैसा शायद पिछले 15 साल में नहीं हुआ था। कार्वी का किस्सा सबको पता है। पर इसके अलावा रिटेल निवेशकों को भारी चपत लगाने वाले ब्रोकरेज हाउसों में वेल्थ मंत्रा, इंडिया निवेश, फेयरवेल्थ, मोडेक्स, आम्रपाली आद्या, कास्सा फिनवेस्ट, यूनिकॉर्न, वसंती, फाइकस सिक्यू. व एलायड फाइनेंस जैसे नाम शामिल हैं। अब शुक्र का अभ्यास…और भीऔर भी

दीए की लौ पर पतंगों की तरह नए-नए रिटेल ट्रेडर शेयर बाज़ार की तरफ लपके चले आ रहे हैं। तमाम ब्रोकरेज़ हाउस खुश हैं कि नई पीढ़ी के निवेशक ज़ोर-शोर से डीमैट खाते खुलवा रहे हैं। दरअसल, ऑनलाइन ट्रेडिंग, कम ब्रोकरेज़, भांति-भांति के एप्प, धन व स्टॉक्स के आसान ट्रांसफर और कोरोना संकट में घर से काम करने की सहूलियत ने शेयर बाज़ार में खेलने को हाल-फिलहाल फुरसत का धंधा बना दिया है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी