निफ्टी व सेंसेक्स ही नहीं, उनमें शामिल आधी से ज्यादा कंपनियां या तो ऐतिहासिक शिखर पर हैं या उससे 5-10% फासले पर। अन्य सूचकांकों में शामिल कंपनियों का भी यही हाल है। केवल सरकारी कंपनियां ही इसका अपवाद हैं। लेकिन उनको लेकर सेंटीमेंट अक्सर इतना डूबा रहता है कि लगता है कि उनमें हाथ लगाया तो ट्रेडिंग का दांव मजबूरन लंबे निवेश में बदलना पड़ेगा। ऐसे में ट्रेड करें तो किन स्टॉक्स में? अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

विदेशी संस्थाओं से देशी संस्थाएं निपट लेती हैं। हाई नेटवर्थ या एचएनआई निवेशकों के पास अनुभव से निकली महारत है। प्रोफेशनल ट्रेडर बाज़ार के दांवपेंच के उस्ताद हैं। आखिर, रिटेल ट्रेडरों के लिए क्या रास्ता है? क्या उन्हें बड़ी कपनियां छोड़कर छोटी कंपनियों में ट्रेडिंग के मौके ढूंढने चाहिए? नहीं, क्योंकि बैलगाड़ी से रेल का मुकाबला नहीं किया जा सकता। उन कंपनियों में कभी ट्रेड न करे, जिनका नाम आपने नहीं सुना हो। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

माना जाता है कि किसी भी समय किसी स्टॉक का भाव हज़ारों/लाखों निवेशकों के फैसलों का सम्मिलित नतीज़ा होता है। वह एक तरीके से भीड़ के विवेक को दर्शाता है। इसी से ट्रेन्ड बनता है और ट्रेडर को हमेशा ट्रेन्ड के साथ, उसकी दिशा में चलना चाहिए। लेकिन सवाल उठता है कि क्या स्टॉक के भाव वाकई भीड़ तय कर रही है या मुठ्ठीभर एफआईआई जो आज के हर्षद मेहता बन गए हैं? अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक जब इतनी भारी रकम हमारे शेयरों में लगाएंगे तो उनके भावों का आसमान छूना लाज़िमी है। बाहर से सस्ता धन लाकर उन्होंने अच्छी कंपनियों के शेयर आम भारतीयों की पहुंच से बाहर कर दिए हैं। बीते हफ्ते निफ्टी-50 सूचकांक 35.90 के पी/ई पर ट्रेड हो चुका है। अभी तक इस सूचकांक का औसत पी/ई 20 के आसपास रहता आया है। इस तरह हमारा बाज़ार हो गया औसत से 79.50% महंगा। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

आधिकारिक व अंतिम आंकड़ों के मुताबिक इस साल मार्च में कोरोना से घबराकर विदेशी पोर्टफोलियो या संस्थागत निवेशकों (एफपीआई/ एफआईआई) ने हमारे शेयर बाज़ार से शुद्ध रूप से 61,972.75 करोड़ रुपए निकाले थे। वहीं, नवंबर महीने में उन्होंने शुद्ध रूप से इसमें 60,357.67 करोड़ रुपए डाले हैं। पूरे कैलेंडर वर्ष 2020 में जनवरी से नवंबर तक के 11 महीनों में उन्होंने भारतीय शेयर बाज़ार में शुद्ध रूप से 1,08,244.71 करोड़ रुपए लगाए हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

टेक्निकल एनालिसिस पर बहुत सारी जानकारी आपको इंटरनेट पर मिल जाएगी। उनका अभ्यास आप बीएसई या एनएसई की साइट पर मुफ्त में उपलब्ध चार्टिंग सुविधा से कर सकते हैं। वहां आप हरेक इंडीकेटर आजमाकर देख सकते हैं। आरएसआई केवल भावों के दैनिक चार्ट का मायने रखता है; 30 के आसपास तो खरीद और 70 से ऊपर तो बिकवाली की आशंका। लेकिन भाव तय करने का असली कारक है बैंकों व संस्थाओं का रवैया। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

कैंडल का आकार ही नहीं, चार्ट पर उनकी पोजिशन भी अहमियत रखती है। हैमर सबसे नीचे और रिवर्स हैमर सबसे ऊपर होने पर सबसे ज्यादा प्रभावशाली होता है। बीच में इधर-उधर कहीं हों तो उनका खास मायने-मतलब नहीं होता। कैंडल के अलावा टेक्निकल एनालिसिस में हम ज्यादा नहीं, बस दो-तीन इंडीकेटर की समझ बनाकर अभ्यास कर लें तो काम भर की स्पष्टता आ जाती है। इसमें आरएसआई और मूविंग औसत सबसे अहम हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार में हमेशा खरीदे-बेचे गए शेयरों की सख्या बराबर होती है। खरीदनेवालों का जोश ज्यादा तो उसके भाव बढ़ते हैं, जबकि बेचनेवाले हावी तो भाव गिरते हैं। किसी दिन हुई ट्रेडिंग में भावों ने चार्ट पर कैसा कैंडल बनाया है, इसके संकेत मिलता है कि तेजड़ियों का पलड़ा भारी है या मंदड़ियों का। इसमें भी कैंडल का रंग नहीं, आकार खास मायने रखता है। हथौड़ा/हैमर तो तेज़ी। रिवर्स/इन्वर्टेड हैमर या लट्टू तो मंदी। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अगर आपने शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग करने की ठान ही ली है तो पूंजी लगाने व बचाने के साथ ही कुछ बुनियादी काम आपको करने होंगे। इसमें से पहला है टेक्निकल एनालिसिस का व्यावहारिक अध्ययन। इसके दम पर आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि किसी स्टॉक में किन भावों पर खरीद का पलड़ा भारी हो सकता है और कहां बिकवाली का। अमूमन इसी के आधार पर स्टॉक की अगली चाल तय होती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

जमे-जमाए ईमानदार वित्तीय सलाहकार मानते हैं कि आम लोगों को शेयर बाज़ार में वही धन लगाना चाहिए जो आवश्यक ही नहीं, आकस्मिक ज़रूरतों तक के इंतज़ाम के बाद इफरात बचता है। इसमें से भी 95% निवेश में लगाना चाहिए और केवल 5% ट्रेडिंग में। ट्रेडिंग के लिए न्यूनतम अगर 5 लाख रुपए चाहिए तो सिद्धांततः उनके पास एक करोड़ रुपए इफरात होने चाहिए। लेकिन आम आदमी का दिल है कि मानता ही नहीं! अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी