ट्रेडिंग में अलग धार कैसे लाई जाए? इसके लिए पहले यह धारणा मन से निकाल देनी होगी कि सॉफ्टवेयर आधारित एल्गोरिदम ट्रेडिंग किसी इंसान के दिमाग को मात दे सकती है। फिर, बाज़ार के अलग-अलग सेगमेंट हैं। ज़रूरी नहीं कि हर तरफ हाथ-पैर मारा जाए। ध्यान रहे कि दो-चार दिन में शेयरों के भाव का बढ़ना-घटना उनकी तरफ आते या उनसे दूर जाते धन के प्रवाह पर निर्भर है। अगर कोई धन के आने-जाने का यह समीकरणऔरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग किताबी ज्ञान नहीं, बाज़ार की पल-पल बदलती व्यावहारिक हकीकत से चलती है। यहां हर पल लालच और डर की इंसानी भावनाएं हिलोर मारती रहती हैं। ठंडी गणनाओं पर काम करनेवाले ट्रेडिंग सॉफ्टवेयर भी सक्रिय हैं। लेकिन उनके पीछे सक्रिय इंसान है और जीतता भी इंसान है अपनी धार की बदौलत। यह भी अकाट्य सच है कि हरेक इंसान की अपनी अलग धार होती है। सारा कुछ पढ़ने, सीखने व जानने के बाद आपऔरऔर भी

सालों-साल से यही कड़वा सच है कि शेयर बाज़ार में 95% (ज्यादातर रिटेल) ट्रेडर घाटे में रहते हैं, जबकि केवल 5% ट्रेडर कमाते हैं। ऐसा तब, जब इस समय ट्रेडिंग सीखने की किताबों से लेकर यू-ट्यूब चैनल भरे पड़े हैं। ट्रेडिंग सिखानेवाले गुरुओं की भी कमी नहीं जो खुद ट्रेडिंग से नहीं कमा पाते तो सिखाने का धंधा चलाने लगते हैं। हर छात्र से प्रतिमाह 35,000 से 50,000 रुपए। ऑनलाइन ट्रेडिंग एकेडमी तो डेढ़-दो लाख लेती है।औरऔर भी

इधर रिटेल निवेशक/ट्रेडर जहां एक तरफ शेयर बाज़ार में सीधा निवेश बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ म्यूचुअल फंडों की इक्विटी स्कीमों से धन निकाल रहे हैं। दिसंबर 2020 में म्यूचुअल फंडों की इक्विटी स्कीमों से 13,121 करोड़ रुपए निकले थे, जबकि जनवरी 2021 में यह रकम 12,194 करोड़ रुपए रही है। सवाल उठता है कि क्या रिटेल निवेशकों का आत्मविश्वास इतना बढ़ गया है कि म्यूचुअल फंड का सुरक्षित रास्ता छोड़कर सीधे निवेश का जोखिम उठानेऔरऔर भी

इधर बाज़ार में रिटेल निवेशकों की सक्रियता बढ़ने से डिलावरी आधारित सौदे ज्यादा हो रहे हैं। वे भले ही कम मात्रा में खरीदें, लेकिन ऐसे लाखों निवेशकों की खरीद से शेयरों के भाव चढ़ जा रहे हैं। नतीजतन, फ्चूचर्स के भावों को कैश सेगमेंट के भावों से पीछे दौड़ना पड़ता है। लेकिन यह सिलसिला आखिर कब तक चलेगा। रिटेल ट्रेडरों/निवेशकों की रीत है कि वे अमूमन चोटी पर खरीदते और तलहटी पर बेचते हैं। यही वजह हैऔरऔर भी

रिटेल ट्रेडर टिप्स और भावों के पीछे भागता है। सलाहकार और ब्रोकर अक्सर उसे वही स्टॉक्स खरीदने को कहते हैं जो पहले से चढ़ चुके होते हैं। लेकिन काश, शेयर बाज़ार में भावों की गति इतनी आसान होती! यकीनन, कैश व डेरिवेटिव सेगमेंट आपस में गुंथे हुए हैं और डेरिवेटिव्स कैश में चल रहे भावों की छाया होते हैं। लेकिन डेरिवेटिव सेगमेंट अब इतना बड़ा व स्वतंत्र हो गया है कि पलटकर कैश सेगमेंट को नचाने लगाऔरऔर भी

रिटेल ट्रेडरों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि वे लालच की भावना में डूबकर बाज़ार में उतरते हैं और बिकवाली की स्थिति में फौरन घबराकर बेचने लगते हैं। कंपनियों के 100, 200 या 300 शेयर खरीदते हैं और तब खरीदते हैं जब बाज़ार अपने उफान पर होता है। जब समझदार निवेशक, संस्थाएं, प्रोफेशनल ट्रेडर खरीद चुके हैं तब रिटेल ट्रेडरों की एंट्री होती है। तब अखबार व पत्रिकाओं से लेकर बिजनेस चैनल और ब्रोकरों की टिप्सऔरऔर भी

इधर हमारा शेयर बाज़ार जिस कदर बेतहाशा बढ़ रहा है, उसकी एक वजह रिटेल निवेशकों का पतंगों की तरह उमड़ना भी हो सकता है। इसका संकेत बाजार में बढ़ते वोल्यूम से मिलता है। अमूमन कैश सेगमेंट में 65,000 से 75,000 करोड़ रुपए का वोल्यूम होता था। लेकिन 29 जनवरी को यह 85000 करोड़, बजट के दिन 87,600 करोड़ और 2 फरवरी को तो 1,00,470 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। 4 फरवरी को यह 90,288 करोड़ था, जिसमेंऔरऔर भी

बजट के ठीक पहले से तुलना करें तो पिछले चार दिनों में बीएसई का इंडिया इंफ्रास्ट्रक्चर सूचकांक 12.68% और कैपिटल गुड्स सूचकांक 11.99% बढ़ चुका है। वहीं, इस दौरान खुद बीएसई सेंसेक्स 9.35% बढ़ा है। मतलब साफ है कि फंडामेंटल्स की समझ और संभावना पर चलनेवाले निवेशकों ने बजट में की गई घोषणाओं को गंभीरता से लिया है। वैसे, इस समय इंफ्रास्ट्रक्चर सूचकांक 17.42 के पी/ई पर ट्रेड हो रहा है, जबकि कैपिटल गुड्स सूचकांक 105.85 केऔरऔर भी

शेयर बाज़ार का बम-बम करना अर्थव्यवस्था का मजबूत स्थिति का पर्याय नहीं है। जो कोई शेयर बाज़ार की तेज़ी को अर्थव्यवस्था की मजबूती मानता या बताता है, वो या तो महामूर्ख है या महाधूर्त। अक्सर आर्थिक नीतियों में फिसड्डी साबित हो चुकी सरकारें ही बाज़ार की तेज़ी दिखाकर अपनी नाकामी पर परदा डालती हैं। दरअसल, अभी अपने यहां बाज़ार में जैसी तेज़ी चल रही है, वह सेटीमेंट की वजह से है और सेंटीमेंट तब बनता है जबऔरऔर भी