सृजनात्मक विनाश और विनाशकारी सृजन का सिलसिला अटूट है। जंगल की आग के बाद पहले से ज्यादा बलवान नए अंकुर फूटते हैं। नई तकनीक पुरानी को ले बीतती है। शिव सृष्टि और समाज के इसी सतत विनाश और सृजन के प्रतीक हैं।और भीऔर भी

दुनिया जंगल है और उसकी सारी राहें पत्तों से ढंकी हैं। बड़े होते ही मां-बाप का हाथ छोड़ राह की तलाश में जुट जाते हैं। सच्चा गुरु मिला तो मिल जाती है मंजिल। नहीं तो ताज़िंदगी भटकते रह जाते है।और भीऔर भी

दावाग्नि कितनी भी प्रबल हो, वह पेड़ों को तो जला डालती है, पर जड़ों को नहीं। लेकिन मीठी हवा सुलगा-सुलगाकर जड़ों को भी नष्ट कर देती है। कहा भी गया है कि धीमा ज़हर ज्यादा खतरनाक होता है।और भीऔर भी