ब्रोकर, सब-ब्रोकर या जॉबर ट्रेडिंग करते हैं क्योंकि यही उनका पेशा है। बैंकों या वित्तीय संस्थाओं के ट्रेजरी विभाग के लोग ट्रेडिंग करते हैं क्योंकि यही उनकी नौकरी है। लेकिन जब सामान्य नौकरी करनेवाले ट्रेडिंग के फेर में पड़ते हैं तो अक्सर डूब जाते हैं। असल में नौकरी की हर महीने बंधी तनख्वाह की मानसिकता से ट्रेडिंग नहीं की जा सकती। ट्रेडिंग में कभी जमकर कमाई तो कभी महीनों तक सूखा रहता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

कोई स्टॉक एक दिन में 20% ऊपर-नीचे जा सकता है। संभव है उसका भाव एकदम शून्य हो जाए। ऐसी कोई भी आकस्मिकता शेयर बाज़ार में घट सकती है। क्या कभी आपने ऐसी स्थिति की कल्पना की है? क्या इसके लिए आप तैयार हैं? अगर हां, तभी आप सही मायनों में ट्रेडर हैं। ट्रेडिंग में उतरनेवाले हर शख्स को यह बात कसकर गांठ बांध लेनी चाहिए। यहां बुद्ध जैसी शांति व स्थितिप्रज्ञता ज़रूरी है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयरों के भाव चार चरणों में घूमते हैं। पहला चरण वो है जब भावी संभावनाओं को परखकर उसे दिग्गज संस्थान और समझदार निवेशक खरीदते हैं। दूसरे चरण में प्रोफेशनल ट्रेडर और म्यूचुअल फंड घुसते हैं। तीसरा चरण रिटेल ट्रेडरों की खरीद का होता है। लेकिन तब तक बढ़ने की गुंजाइश खत्म हो चुकी होती है और शेयर सीमित दायरे में भटकने के बाद गिरता चला जाता है। यह भावों का चौथा चरण है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

मान्यता है कि भारतीय बाज़ार का रुख विदेशी निवेशक संस्थाएं तय करती हैं। हो सकता है कि लंबे समय का सच यही हो। लेकिन फिलहाल तो लगता है कि देशी निवेशक संस्थाएं बाज़ार का रुख तय करने लगी हैं। जून महीने में अब तक हर दिन उन्होंने कैश सेगमेंट में शुद्ध खरीद की। इस दौरान विदेशी संस्थाओं की भारी बिकवाली के बावजूद बाज़ार बढ़ा है। देखते हैं, यह रुख कितना टिकता है। चलिए, करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

शेयरों के भाव कभी सीधी रेखा में नहीं, बल्कि लहरों जैसे चलते है। इन लहरों पर अच्छी सवारी गांठनेवाले लोग कमाते हैं, वहीं बिना सोचे-समझे लहरों पर कूदनेवाले डूब जाते हैं। एक और अकाट्य सच है कि भले ही ट्रेडिंग से कंपनियों के शेयरों के भावों की खोज होती है, लेकिन ट्रेडरों के लिहाज से इसमें दरअसल भावुक लोगों की जेब से धन निकलकर बुद्धिमान लोगों की जेब में जाता है, ज़ीरो-सम गेम। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

पक्के ट्रेडरों के बीच में मान्यता है कि हर निवेशक मूलतः ट्रेडर होता है और ट्रेडिंग में फंस जाने पर मजबूरी में दीर्घकालिक निवेशक बन जाता है। लेकिन असलियत ऐसी नहीं। निवेश और ट्रेडिंग के मूलभूत सिद्धांत अलग हैं। दीगर बात है कि सुसंगत निवेश का समय घटकर अब दो साल और कुशल ट्रेडिंग इंट्रा-डे से निकल हफ्ते-दस दिन या एक-दो महीने की हो गई है। हमें यह बदलाव समझना चाहिए। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

सफलता सरलता से पाई जाती है। अगर कामयाबी के चक्कर में जटिलता में उलझे हैं तो थोड़ा ठहरकर सोचिए कि कहीं आप कुछ गलत तो नहीं कर रहे। एक छोटी-सी मिसाल। कल हमने बाज़ार खुलने के पहले बेहद सरल गणनाओं से निकाला कि निफ्टी का संभावित दायरा 7945 से 8055 तक रह सकता है और वास्तविक रेंज 7944.85 से 8057.70 की रही। खैर, इसका मतलब यह नहीं कि सब पहले से तय है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

ग्रीस का ऋण संकट। अमेरिका में ब्याज दर बढ़ने का अंदेशा; इस पर इसी हफ्ते फेडरल रिजर्व अपनी बैठक के बाद बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगा। घर के बादलों पर बाहर की अनिश्चितता की घटा। हालांकि मई में रिटेल मुद्रास्फीति के बढ़ने की चिंता पर अप्रैल में औद्योगिक उत्पादन बढ़ने का उत्साह ज्यादा है। मगर बाज़ार की चाल को जितने कारक प्रभावित करते हैं, उन सभी को कोई नहीं पकड़ सकता। अब देखते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

हाल-फिलहाल दो बार ऐसा हुआ जब बाज़ार तेज़ी से उठा तो लगा कि गिरावट का अंत हो गया। मगर अगले ही दिन यह आशा टूट गई। सवाल उठता है कि गिरावट का यह दौर कब तक चलेगा? सच है कि मोदी सरकार से तमाम अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं, कंपनियों के नतीजे खराब हैं, मानसून भी खराब रहनेवाला है। लेकिन यह सारी नकारात्मकता तो बाज़ार जज्ब कर चुका है! भरोसा रखें। मौसम है, बदलेगा। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

पुरानी कहावत है कि सब धान बाइस पसेरी नहीं होते। इसी तरह हर शेयर का अपना अलग स्वभाव होता है। उनकी चाल में भिन्नता होती है। वे अलग-अलग किस्म के ट्रेडरों या ऑपरेटरों को खींचते हैं। इसलिए हर किसी पर सामान्य नियम नहीं लागू होते। हमें ट्रेडिंग के लिए स्टॉक्स को चुनते वक्त उनके अलग स्वभाव और पैटर्न को समझना होता है। फिर अपने स्वभाव के हिसाब से उनकी लिस्ट बनानी होती है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी