बाकियों का तो पता नहीं, लेकिन अपने यहां सिंगापुर निफ्टी फ्यूचर्स बाजार खुलने से करीब घंटा भर पहले उसकी आम दिशा बता देता है। 100 में 80-90 बार उसका इशारा सही निकलता है। लेकिन है तो वो भारतीय बाज़ार की छाया ही। सो, छाया को ही मूल काया मानने में धोखा हो सकता है। हां, उससे हम सुबह कंप्यूटर या ट्रेडिंग टर्मिनल पर बैठने से पहले हल्का-सा पूर्वानुमान ज़रूर लगा सकते हैं। अब चलाएं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बड़ी गिरावट का आभास तो बाज़ार खुलने के घंटे भर पहले हो गया था। ऐसा देख हमने कहा भी था कि ‘आज ट्रेडिंग कतई न करें’। लेकिन सेंसेक्स 5.94% और निफ्टी 5.92% गिर जाएगा, इसका अंदाज़ किसी को नहीं था। यह 7 जनवरी 2009 के बाद किसी दिन की सबसे तगड़ी गिरावट है। डॉलर भी अब 66.74 रुपए का हो गया है। यकीनन, यह बाहरी घटनाक्रम का असर है। लेकिन सावधानी ज़रूरी है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

साल 2013 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार यूजीन फामा, लार्स पीटर हैन्सेन व रॉबर्ट शिलर को इस निष्कर्ष पर मिला था कि स्टॉक या बांड के भाव अगले कुछ दिनों या हफ्तों में कहां जाएंगे, इसका पूर्वानुमान लगाने का कोई तरीका नहीं है। हां, अगले तीन-पांच साल में कहां जाएंगे, इसका अनुमान काफी हद तक संभव है। फिर भी ट्रेडिंग में लोग क्यों हाथ आजमाते हैं वो अरबों नहीं, खरबों में? सोचिए। अब देखें सोमवार की मार…औरऔर भी

कोयल कभी घोंसला नहीं बनाती। वो बड़ी चालाकी से अपने अंडे कौए के घोंसले में डाल देती है। शेयर बाज़ार में निवेश करना ऐसा ही है। बस ‘कौए’ की सही पहचान होनी चाहिए। ऐसा न हो कि वो आपका ‘अंडा’ ही खा जाए। बुरी कंपनियां निवेशकों की दौलत खा जाती हैं, जबकि अच्छी कंपनियां शेयरधारकों की दौलत बराबर बढ़ाती जाती हैं। आज तथास्तु में ऐसी कंपनी जिसने 37 सालों में दिया है 21% का सालाना चक्रवृद्धि रिटर्न…औरऔर भी

भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के शेयर बाज़ार को लंबे समय में बढ़ते ही जाना है। लेकिन बीच-बीच में ऐसा दौर भी आता है जब बाज़ार गिरावट की गिरफ्त में चला जाता है। तब कुशल ट्रेडर शॉर्ट-सेलिंग से जमकर कमाते हैं। मुश्किल यह है कि अपने यहां शॉर्ट सौदे इंट्रा-डे काटने होते हैं या इन्हें फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस सेगमेंट में ही करना संभव है। इसलिए हम एफ एंड ओ से हमेशा भाग नहीं सकते। आगे शुक्रवार की गिरावट…औरऔर भी

मूल स्टॉक का भाव 1% घटा-बढ़ा तो उसके कॉल-पुट ऑप्शन का भाव 15-20% ऊपर-नीचे हो जाता है। फिर इन ऑप्शन सौदों में धन भी कम लगता है। मसलन, इनफोसिस के 1240 के कॉल का भाव 3 रुपए है। 250 का एक लॉट खरीदा तो मात्र 750 रुपए लगेंगे, जबकि 1150 का पुट 9.45 रुपए का है तो एक लॉट 2362.50 का हुआ। ऊपर से लोग कॉल-पुट साथ खरीदते हैं। मगर, बराबर पिटते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

फ्यूचर व ऑप्शन सौदे मूल कमोडिटी या स्टॉक से ही डेराइव होते हैं, इसीलिए उन्हें डेरिवेटिव्स कहा जाता है। लेकिन उनके भावों के निर्धारण में सीधे-सीधे मांग या आपूर्ति नहीं, बल्कि ब्याज दर जैसे कई कारकों का रोल होता है। जैसे सामान्य अंकगणित का जानकार अमूर्त बीजगणित से पार नहीं पा सकता, वैसे ही कैश बाज़ार का आम ट्रेडर एफ एंड ओ में तीर नहीं मार सकता। पहले यहां तो पारंगत हो जाओ। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

सेबी ने नए नियम के मुताबिक डेरिवेटिव सौदों का आकार पांच से दस लाख रुपए तक होगा। स्टॉक डेरिवेटिव्स का न्यूनतम लॉट 50 और इंडेक्स डेरिवेटिव्स का न्यूनतम लॉट 10 का होगा। ध्यान दें कि 5% मार्जिन पर भी न्यूनतम 25,000 रुपए दांव पर लगाने होंगे। क्या कोई रिटेल ट्रेडर इतनी ज्यादा पूंजी एक सौदे में झोंक सकता है? क्यों नहीं! शेयर 1% बढ़ा तो 20% फायदा! यही लालच उसे निगल जाता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बच्चा चांद के खिलौने की जिद करता है, जबकि बड़ा होने पर जानता है कि चांद को ज़मीन पर लाना मुमकिन नहीं; उस तक पहुंचने के लिए विशेष यान बनाने पड़ेंगे। ऐसा ही बचकानापना आम रिटेल ट्रेडर डेरिवेटिव सौदों की जिद ठानकर करते हैं। वो ऐसा न कर पाएं, इसलिए पूंजी बाज़ार नियामक, सेबी ने नवंबर माह से डेरिवेटिव सौदे का न्यूनतम आकार दो से बढ़ाकर पांच लाख रुपए का कर दिया है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

भारत विशाल संभावनाओं वाला देश है। प्रकृति की जैसी कृपा व संपदा हमारे पास है, जैसा इंसानी जीवट देश के कोने-कोने तक फैला है, उसके आपसी मेल से भारत कहीं का कहीं पहुंच सकता है। और, इस मेल-मिलाप व सहयोग का मंच बाज़ार उपलब्ध कराता है। सरकार इसके खिलने में बाधा न डाले, माकूल नीतियों से इसे प्रेरित करे तो बाकी काम अवाम की उद्यमशीलता कर डालती है। इसी का नमूना है तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी