आईआईटी या आईआईएम से निकलने वाले बहुत से विद्यार्थी धनार्थी बनने के चक्कर में स्टार्ट-अप की तरफ भाग रहे हैं। लेकिन सही मायनों में वे उद्यमी नहीं है क्योंकि उद्यमी वो शख्स होता है जो सुरक्षा की परवाह किए बगैर नए धंधे में उतर जाता है। जो बच्चे आईआईटी या आईआईएम में जाते हैं वे तो परम सुरक्षा की खातिर ये डिग्रियां पाने जाते हैं। महज धन के पीछे भागनेवाला उद्यमी नहीं होता। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

आजकल लोगों को नौकरी कम जमती है। स्टार्ट-अप बन चुके हैं और बनते ही जा रहे हैं। उद्यमियों की भी भरमार है। सभी आर्थिक आज़ादी चाहते हैं। वित्तीय बाज़ार में भी लोगबाग यही आज़ादी हासिल करने के लिए आते हैं। सभी रिस्क लेते हैं। लेकिन स्टार्ट-अप, उद्यमी, निवेशक या ट्रेडर के रिस्क लेने का स्तर भिन्न होता है। उद्यमी रिस्क ही रिस्क लेता है, जबकि ट्रेडर हिसाब से रिस्क लेता है। अब पकड़ते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

भारतीय अर्थव्यवस्था में अगले बीस सालों तक ठहराव या मंदी आने का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि 125 करोड़ की आबादी में से अभी तक 100 करोड़ का बाज़ार तो खुला ही नहीं है। हमारा जीडीपी इस साल मरी-गिरी हालत में भी 7.4% बढ़ना चाहिए। वो भी तब, जब कृषि की विकास दर शायद 0.1% भी न रहे। सोचिए, कृषि अगर 4% सालाना बढ़ने लगे तो जीडीपी कहां पहुंच जाएगा! आज कृषि से जुड़ी एक जानदार कंपनी…औरऔर भी

हमारा अहम स्वभाव है कि हम दुविधा नहीं, पक्का चाहते हैं। साफ हां-ना में जवाब चाहते हैं और उसके आधार पर फैसला करते हैं। लेकिन फाइनेंस में निश्चित स्वीकार या नकार नहीं होता। शून्य और एक प्रायिकता के दो छोर हैं। वास्तविक प्रायिकता कहीं इसके बीच होती है। दिक्कत यह है कि 20-30% को हम शून्य और 60-70% को 100% बना देते हैं। यह अतिवादी सोच बाज़ार में हमें कहीं का नहीं छोड़ती। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हम अक्सर अतिविश्वास में डूबे होते हैं। सौदा पिटने के बावजूद खुद को सही मानते हुए उससे चिपके रहते हैं। जैसे बंदरिया मरे हुए बच्चे को सीने से चिपकाए रहती है। स्वीकार कीजिए कि हम सही होने का सट्टा-बयाना लिखाकर नहीं आए हैं। बड़े-बड़े दिग्गज गलत हो जाते हैं तो हमारी क्या बिसात! सही तो ठीक। गलत तो पहला स्टॉप-लॉस लगते ही बाहर। चिपकने नहीं, छोड़ने में जीतने की असली सोच छिपी है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

हम सभी के साथ समस्या है कि हम पछताते बहुत हैं। बार-बार ऐसा होता है कि कोई शेयर देखकर छोड़ देते हैं। अगले दिन जब वो 5% से ज्यादा उछल जाता है तो पछताते हैं कि काश! वो सौदा पकड़ लिया होता। असल में, यह सामान्य मानव मनोविज्ञान है। लेकिन यह सहजता-भरी सोच ट्रेडिंग के लिए घातक है। हम समय में पीछे नहीं जा सकते। इसलिए हमेशा आगे देखने का अभ्यास करना चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बहुत सारे लोग मानते हैं कि शेयर बाज़ार सटोरियों का अड्डा है और यहां अधिकांश लोग जुआ खेलते हैं। यह मान्यता बहुत हद तक सही भी है। पिछले ही हफ्ते एक सब्सक्राइबर ने लिखा कि ऐसा जैकपॉट बताइए कि किस्मत चमक जाए। कैसे कहूं कि यह सोच एक तरह का डिप्रेशन दिखाती है। सच है कि बाज़ार में भविष्य का कयास लगाया जाता है, लेकिन यह सट्टेबाज़ी की तरह अंधा नहीं होता। अब निकालें मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार को समझने और पकड़ने के लिए कोशिश अर्थशास्त्र के जनक एडम स्मिथ के ज़माने से ही हो रही है। एक राय यह है कि भाव सभी पुरानी व नई उपलब्ध सूचनाओं के अलावा भावी संभावनाओं को भी जज्ब किए होते हैं। इसलिए अब तक के भावों का विश्लेषण कल के भावों का एकदम सटीक हाल बता देगा। वहीं, दूसरी राय इंसान की स्वभावगत कमज़ोरियों को भी तवज्जो देती है। अब देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अप्रैल 2011 में 115 पर खरीदने को सुझाया सुप्रीम इंडस्ट्रीज अप्रैल 2015 में 745 पर पहुंच गया। मई 2014 में 45 पर सुझाई गई कंपनी अभी 100 के आसपास है। चाहें तो हम दावा कर सकते हैं, हमारी निवेश सलाह सबसे अच्छी होती हैं। लेकिन सबसे अच्छा निवेश जैसी कोई चीज़ नहीं होती। रिस्क और रिटर्न का अभिन्न नाता ही निवेश की आत्मा है। 100 पर पहुंची कंपनी दे सकती है और 40% रिटर्न…और भीऔर भी

ट्रेडिंग से कमाना चाहते हैं तो गांठ बांध लें कि शेयरों के भाव या बाज़ार का कोई भी पूर्वानुमान 100% सही नहीं हो सकता। यहां प्रायिकता चलती है। सिक्का उछालने पर हेड/टेल आने की प्रायिकता 50% रहती है। वैसे ही बाज़ार में प्रायिकता चलती है। हम ज्यादा प्रायिकता वाले सौदे चुनते हैं और चूकने पर चोट न खाएं, इसके लिए स्टॉप लॉस या पोजिशन साइजिंग का सहारा लेते हैं। अब करते हैं नए संवत का पहला अभ्यास…औरऔर भी