सनसनी महज न्यूज़ चैनलों पर ही नहीं, शेयर बाज़ार में भी फैलाई जाती है। स्मार्टफोन से खटाखट संदेश भेजे जाते हैं। अब तो व्हाट्स अप का ज़माना है। किसी वाहियात कंपनी का नाम लेकर बताते हैं कि बड़ा ब्रोकिंग हाउस उस पर खरीद रिपोर्ट जारी करनेवाला है। रिपोर्ट आते ही 22 रुपए से अगले हफ्ते यह शेयर 50 तक पहुंच जाएगा। इसलिए फटाफट खरीद लें। वरना पछताएंगे। उनकी इस चाल में फंसे बगैर देखें बुध की बुद्धि…औरऔर भी

बाज़ार में अफवाह फैलाने के पीछे शोबाज़ मानसिकता के ही लोग होते हैं। दिखाते ऐसे हैं कि रतन टाटा, मुकेश अंबानी या कुमारमंगलम बिड़ला तक इनकी सीधी पहुंच हो। वित्त मंत्रालय के आला अधिकारियों और वित्त मंत्री अरुण जेटली को तो ये लोग जेब में लिए टहलते हैं। असल में ये लोग मानसिक रूप से बीमार होते हैं। इसलिए हमें न तो उनका अपमान करना चाहिए, न ही उन्हें कोई अहमियत देनी चाहिए। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

हमारे समाज में बहुतेरे लोग आदतन खुद को तोप-तमांचा साबित करने में लगे रहते हैं। जानते नहीं कि मैं कौन हूं? ऐसे जुमले आपने भी बराबर सुने होंगे। यही लहज़ा शेयर बाज़ार से जुड़े लोगों में भी नज़र आता है। डंके की चोट पर बताते हैं कि फलांना शेयर कहां तक जानेवाला है। दरअसल, इस हवाबाज़ी के पीछे खुद को महत्वपूर्ण बताने की मानसिकता काम कर रही होती है। इन्हें किनारे रखकर देखें अब सोम का व्योम…औरऔर भी

मंगलम ड्रग्स में हमने निवेश की पहली सलाह पांच साल पहले जब 22 नवंबर 2010 को दी थी, तब उसका शेयर 20 रुपए पर था। 1 जनवरी 2015 तक वो वहीं अड़ा रहा। लेकिन वहां से उठा तो 8 दिसंबर तक 20 से सीधे 441 तक पहुंच गया। फिर गिरा तो महीने भर में 261 तक पहुंच गया। फिर भी 2015 में 1205% का सर्वाधिक रिटर्न इसी शेयर ने दिया है। अब आज का तथास्तु…और भीऔर भी

हम हाई-फ्रीक्वेंसी या अल्गोरिदम ट्रेडिंग से आक्रांत रहते हैं। भूल जाते हैं कि उन्नत से उन्नत सॉफ्टवेयर भी इंसान को मात नहीं दे सकता। हम आक्रांत रहते हैं कि संस्थाएं और एचएनआई करोड़ों में खेलते हैं, जबकि हम उनके सामने पिद्दी भी नहीं हैं। लेकिन हर कमज़ोरी में कोई न कोई ताकत छिपी होती है। जिस तरह हाथी को मुड़ने में वक्त लगता है, वैसे ही संस्थाएं छोटे सौदों से नहीं कमा पातीं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

पूंजी, दरअसल हमारी बड़ी सीमा है। हम ऑप्शंस खरीदते हैं क्योंकि उसमें कम पूंजी लगती है। लेकिन हकीकत यह है कि ऑप्शंस खरीदना अक्सर घाटे का सौदा होता है। रिसर्च से पता चला है कि ऑप्शंस के दाम अमूमन औकात से ज्यादा चढ़े होते हैं। इसलिए फायदा उन्हें बेचने या राइट करने में है, न कि खरीदने में। लेकिन ऑप्शंस बेचने के लिए कम से कम 5 लाख रुपए की पूंजी होनी चाहिए। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

कोई शेयर चंद दिनों में 20-25% बढ़ जाए या हमने जिसे बेचा वो उसके बाद भी जमकर चढ़ जाए तो हमारा दिल मसोस कर रह जाता है। वास्तविकता यह है कि बाज़ार हर कारोबारी दिन खुलता है और ट्रेडिंग के सैकड़ों अच्छे अवसर फेंकता है। लेकिन बाज़ार के सारे अवसर हमारे नहीं हो सकते क्योंकि हमारी पूंजी और दायरा सीमित है। अपनी सीमा को समझकर आगे देखें, पीछे देखना निरर्थक है। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में सबका मसकद अलग-अलग होता है। एनालिस्ट का मकसद भौकाल बनाना है ताकि वो अपना और अपनी फर्म का फायदा करा सके। हमारा फायदा उसका मकसद नहीं है। ब्रोकर का मकसद हमसे ज्यादा से ज्यादा ट्रेड कराना होता है ताकि उसे जमकर ब्रोकरेज मिल सके। हमें भी साफ होना चाहिए कि हम ट्रेडिंग क्यों कर रहे हैं क्योंकि हम इतने रईस नहीं हैं कि इतना महंगा शौक पाल सकें। अब पकड़ते हैं मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

स्टेडियम में जाकर फुटबॉल या क्रिकेट मैच देखना उन्हीं लोगों को शोभा देता है जिनके पास इफरात धन है या जिन्हें अपने शौक की दीवानगी है। इसी तरह ट्रेडरों का भी एक तबका है जो बाज़ार में रोमांच के लिए आता है। दस-बीस हज़ार रुपए इधर-उधर हो जाएं तो उन्हें फर्क नहीं पड़ता। लेकिन जो वित्तीय आज़ादी या नियमित आय के लिए ट्रेडिंग करते हैं, उन्हें रोमांच कतई शोभा नहीं देता। अब देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

दुनिया-जहान में कुछ भी स्थाई या शाश्वत नहीं। बदलाव ही शाश्वत सच है। हमें दिखे या न दिखे, भौगोलिक परिवेश के साथ ही हमारे निजी व सामाजिक जीवन में बराबर परिवर्तन होते रहते हैं। बदलाव के साथ चलने वाली कंपनियों का ही धंधा निरंतर बढ़ता है। इधर दुनिया डिजिटल होती जा रही है। ‘डिजिटल इंडिया’ पर आगे कुछ सालों में 4.5 लाख करोड़ रुपए खर्च होने जा रहे हैं। आज तथास्तु में डिजिटल लहर पर सवार कंपनी…औरऔर भी