जहां लाखों लोगों की भावनाएं चल रही हों, करोड़ों के सौदे पूरा हिसाब-किताब लगाकर किए जा रहे हों, वहां बाज़ार या किसी शेयर के भाव कहां जाएंगे, इसकी सटीक गिनती करना नामुमकिन है। ऐसे में शेखचिल्ली की तरह दिवास्वप्न देखना निरी मूर्खता है कि हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही होगा। कोई दूसरा आपको बताता है कि उसके पास भविष्य में झांकने का पक्का फॉर्मूला है वो आपको उल्लू बना रहा होता है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

जिसे जानना मुश्किल ही नहीं, असंभव है उसे जानने का दावा करना वित्तीय बाज़ार का धंधा बन चुका है। हम सभी सिर उठाए पूछते रहते हैं कि कच्चा तेल कहां तक गिरने के बाद कितना उठेगा? फलानां शेयर कितना और गिर सकता है? बाज़ार कहां पर टॉप बनाएगा और इसका बॉटम क्या है? निवेशकों व ट्रेडरों की इसी मूढ़ता व अतार्किक जिज्ञासा पर तमाम विश्लेषकों और बिजनेस चैनलों का धंधा चलता है। अब देखें सोम का व्योम…औरऔर भी

कंपनियों का धंधा उतनी तेज़ी से नहीं बदलता जितनी तेज़ी से शेयर बाज़ार ऊपर या नीचे होता है। कंपनी का धंधा मजबूत होने के बावजूद उसका शेयर गिर सकता है क्योंकि बाज़ार का मूल्यांकन या पी/ई अनुपात तमाम वजहों से नीचे आ जाता है। यही मूल्यांकन हमें किसी अच्छी कंपनी में घुसने और निकलने का मौका देता है। पी/ई ज्यादा तो बेचकर निकल लिए और पी/ई कम तो निवेश कर लिया। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

अमेरिका में पचास लाख करोड़ डॉलर ईमानदार मेहनत और बचत से आए होते तो आज दुनिया के हालात कुछ और ही होते। तब, फेडरल रिजर्व को ब्याज दर को असहज तरीके से शून्य या उसके पास रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पिछले दस सालों में उसकी इस नीति के कारण अमेरिका के बचतकर्ताओं को करीब आठ लाख करोड़ डॉलर गंवाने पड़े हैं। ऊपर से सस्ता अमेरिकी धन वैश्विक बाजारों को फुलाए पड़ा है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

आज की ग्लोबल दुनिया में भारत जैसे बाज़ार अमेरिका, यूरोप, जापान व चीन के हालात से खूब प्रभावित होते हैं। फेडरल रिजर्व ने तय किया कि ब्याज दरों को सामान्य स्तर पर लाने में हड़बड़ी नहीं बतरेगा तो डाउ जोन्स सूचकांक दो दिन में 1.6% उछल गया जबकि अमेरिकी कंपनियों का लाभ तीन तिमाहियों से घट रहा है और औसत अमेरिकी परिवार की आय दस साल पहले से भी कम है। अब नज़र सोमवार के व्योम पर…औरऔर भी

पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं। लेकिन अच्छी कंपनियों को निखरने में चार-पांच साल लग जाते हैं। मगर, बाज़ार की नज़र में चढ़ते ही तमाम लोग उन्हें पकड़ने लगते हैं और उनके शेयर उठने लगते हैं। स्मॉल-कैप कंपनियों के साथ यही होता है। अंतर्निहित ताकत उन्हें बड़ा बनाती जाती है। धीरे-धीरे एक दिन वे साधारण निवेशक की पहुंच से दूर चली जाती हैं। तथास्तु में आज एक कंपनी जो फिलहाल निखरने के मुहाने पर है।औरऔर भी

प्रक्रिया अपनाते हैं तो आपका भरोसा नहीं टूटता। धीरे-धीरे धारणा बनती जाती है कि वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग भी एक बिजनेस है जिसमें आप कुछ महीने खूब कमाते हैं तो कुछ महीने ठन-ठन गोपाल रहते हैं। कसौटी यह होनी चाहिए कि आपकी अपनाई प्रक्रिया लंबे समय में लाभप्रद है या नहीं। ट्रेडिंग में लंबा समय साल भर का होता है। इस दौरान आपको हमेशा अपनी मूल ट्रेडिंग पूंजी को सलामत रखकर चलना चाहिए। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

आप सिक्का उछाल कर ट्रेड करें, तब भी कई बार सफल हो सकते हैं। लेकिन यह सिर्फ संयोग का खेल है जिसे रणनीति का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता। इसीलिए ठोस प्रक्रिया अपनाई जाती है। यह प्रक्रिया सबके लिए अलग हो सकती है। लेकिन दुनिया के सभी सफल ट्रेडर हमेशा कोई न कोई प्रक्रिया चुनकर उसका पालन करते हैं। आपके हर ट्रेड के पीछे तर्क होना चाहिए ताकि उसे उन्नत बनाया जा सके। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

सफल रणनीति का कोई बना-बनाया पैटर्न नहीं होता। दस में से छह में सफलता महज़ एक औसत है। कई बार दस में से नौ ट्रेड निशाने पर लगते हैं। कई बार दस में आठ ट्रेड घाटा लगाते है। ट्रेडिंग की सफल रणनीति के दो अहम पहलू हैं। पहली बात, उसका दीर्घकालिक प्रदर्शन अच्छा होना चाहिए। दूसरी बात, उसमें अपनाई गई प्रक्रिया सुपरिभाषित और मजबूत होनी चाहिए। उसमें तीर या तुक्के की गुंजाइश नहीं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

नया मुल्ला ज्यादा प्याज़ खाता है। इसी तरह नया ट्रेडर हर ट्रेड से कमाना चाहता है। घाटा लगने पर सोचता है कि कुछ गलत कर रहा है। इस चक्कर में टिप्स देनेवालों के पास भागता है। लेकिन हकीकत यह है कि अच्छी रणनीति भी घाटा दिला सकती है और वाहियात रणनीति भी कभी-कभार मुनाफा करा सकती है। दस में से छह ट्रेड सही निकलें तो यकीनन आपकी रणनीति अच्छी है। आइए, अब पकड़ते हैं मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी