समग्र आकलन जितना वस्तुगत व निरपेक्ष होगा, उतनी ही अधिक उसके सही बैठने की प्रायिकता होती है। यह प्रायिकता 70-80% हो तो क्या कहने! लेकिन प्रायः हम कभी वस्तुगत आकलन कर ही नहीं पाते हैं। इसकी एक वजह तो यह है कि सारे कारकों का पता-ठिकाना हमें मालूम नहीं होता। दूसरे, आकलन में हम आत्मगत पहलू या अपने मन की बात घुसेड़ देते हैं। ऐसे में प्रायिकता में बट्टा लग जाता है। अब आजमाएं बुध की बुद्धि…औरऔर भी

बाज़ार में पक्का कुछ नहीं होता। फिर भी राह निकालने के लिए अपनी तरफ से मशक्कत करनी पड़ती है। रात बीतने ही पिछले भाव अतीत बन जाते हैं। इसके बावजूद ट्रेडर उनके पैटर्न से आगे का अनुमान लगाते हैं। यह अनुमान गणित व सांख्यिकी के मेल से भी निकाला जा सकता है और भावों के चार्ट पर बनती आकृतियों से भी। जिसको जो भाए, उसको उस तरीके से भावी आकलन करना होता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बाज़ार की अगली चाल कौन-सी चीज़ें तय करती हैं? उसमें जितने भी लोग सक्रिय हैं चाहे वो देशी या विदेशी संस्थाएं हों या एचएनआई निवेशक और भेड़चाल चलते रिटेल निवेशक, इन में सभी की हरेक हरकत का मेल। इसके ऊपर इन लाखों शक्तियों के भिन्न क्रम और मेल का असर। जैसे, लाखों वनस्पतियां जंगल के स्वभाव का निर्धारण करती हैं। फिर भी हम जंगल से पार पाने की जुगत निकालते हैं। अब पकड़ते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

80-85% भारतीयों के पास ज़रूरी खर्चों को पूरा करने के बाद इतना नहीं बचता कि भविष्य के लिए अलग से बचा सकें। इसीलिए बीमा व पेंशन जैसी सरकारी स्कीमों के ज़रिए सामाजिक सुरक्षा की बड़ी ज़रूरत है। फिर भी निवेश की इस धारणा पर हमें सोचना चाहिए कि खर्च के बाद जो बचे, उसे बचाने के बजाय, बचाने के बाद जो बचे, उसे ही खर्च करना चाहिए। अब तथास्तु में बचत को दौलत बना सकनेवाली एक कंपनी…औरऔर भी

बहुतेरे ट्रेडर अफसोस करते हैं कि उतने भाव पर खरीदा या बेचा होता तो फायदे में रहता। इसी सोच में दिवास्वप्न देखते रहते हैं। भूल जाते हैं कि ट्रेडिंग से कमाई का असली सूत्र सही एंट्री या निकलने के बजाय सौदे का सही आकार है। सौदे का आकार इतना हो कि उसके उल्टा पड़ने की बेचैनी दिन-रात न सताए। एक सौदा ज्यादा से ज्यादा 0.5-1% ट्रेडिंग पूंजी ही डुबाए। बाकी तो प्रायिकता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बाज़ार को पकड़ना किसी के लिए संभव नहीं। अकेले भावों से उसकी थाह लगाना तो एकदम मुमकिन नहीं क्योंकि भाव तो छाया हैं और छाया से काया को नहीं पकड़ा जा सकता। असल में भाव बहुत सारे कारकों से मिलकर बनते हैं। इन कारकों को ध्यान में रखते हुए उनकी भावी चाल का अंदाज़ भर लगाया जा सकता है। यहां पक्का कुछ नहीं, केवल प्रायिकता या संभावना ही निकाली जा सकती है। अब पकड़ें गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में घातक धारणा फैली हुई है कि भाव ही भगवान है। कुछ लोग सारी टेक्निकल एनालिसिस को छोड़कर दावा करते हैं कि केवल भावों के आधार पर बाज़ार को पकड़ा जा सकता है। लोगों को लगता है कि वाह! कितना आसान है। खाली भाव देखना सीख लो तो कमाई ही कमाई होने लगेगी। वे सीखने के चक्कर में दस-बीस हज़ार गंवा देते हैं। लेकिन कमाई में ठन-ठन गोपाल बने रहते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

युद्ध के मैदान में कोई सोचे कि हम ही हम हैं, दूसरा नहीं तो पलक झपकते ही कोई उसे खत्म कर सकता है। लेकिन शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में अक्सर छोटे ही नहीं, बड़े शहरों के सामान्य लोग इसी अहंकार के साथ उतरते हैं। उनको लगता है कि उन्होंने जैसा सोचा है, वैसा ही होगा। पहले छोटा घाटा, उसे निकालने के चक्कर में बड़ा घाटा और फिर खल्लास। आखिरकार, मामू वापस दुकान पर। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

कंपनियों के सालाना नतीजों का मौसम है। अधिकांश लोग मानते हैं कि नतीजे अच्छे होंगे तो शेयर चढ़ेंगे और खराब होंगे तो गिरेंगे। लेकिन अक्सर बाज़ार में ऐसा होता नहीं। खराब नतीजों पर भी कंपनी के शेयर उछल जाते हैं और अच्छे नतीजों पर भी लुढ़क जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि शेयरों के भाव नतीजों या खबरों पर नहीं, बल्कि उन पर ट्रेडर क्या प्रतिक्रिया दिखाते हैं, इससे तय होते हैं। अब देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

दस साल पहले घी का दाम 120 रुपए/किलो, सोने का दाम 8500 रुपए/दस ग्राम और सेंसेक्स 12,000 अंक पर था। इस समय घी 450 रुपए, सोना 30,000 रुपए और सेंसेक्स 25,225 पर है। इस तरह इन दस सालों में घी 275%, सोना 253% और सेंसेक्स 113% बढ़ा है। सेंसेक्स का इन तीनों में सबसे कम बढ़ना दिखाता है कि अर्थव्यवस्था में दौलत का सृजन नहीं हो रहा है। तथास्तु में आज की कंपनी दौलत बनाने के लिए…औरऔर भी