नोटबंदी कितनी सफल होगी और प्रधानमंत्री मोदी 50 दिन बाद ‘सपनों का भारत’ दे पाएंगे या नहीं, इस पर अभी से कुछ कहना मुश्किल है। वैसे ‘सपनों का भारत’ इतना छोटा नहीं हो सकता कि इतने कम समय में हासिल हो जाए। लेकिन इतना साफ है कि आम जीवन से लेकर नोटों तक में भविष्य डिजिटल का ही होना है। आज तथास्तु में ऐसी सॉफ्टवेयर कंपनी जो अब डिजिटल जगत में अपना सिक्का जमाती जा रही है…औरऔर भी

जब हम बाज़ार के अंतर्निहित रिस्क को इतना समझ लेते हैं कि ड्राइविंग की सावधानियां की तरह वो हमारे अवचेतन में बैठ जाता है, तभी हम दरअसल ट्रेडिंग की रिंग में उतरने लायक बनते हैं। जाहिर है कि यह लायकी किनारे बैठकर नहीं आ सकती। लेकिन जब तक हम इस समझ तक नहीं पहुंचते, तब तक हमें ज्यादा ही सावधान रहना पड़ता है। नहीं तो सावधानी हटते ही दुर्घटना हो जाती है। अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार किसी नियम का गुलाम नहीं। कब कौन-सी दिशा पकड़ लेगा, पक्का बता पाना असंभव है। वो किसी एक इंसान की मर्जी से नहीं, बल्कि लाखों या करोड़ों लोगों के मन व गणनाओं से चलता है। इनसे बनती है उसकी सामूहिक इच्छा जो रैंडम या यदृच्छया चलती है। ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने, अमेरिका में ट्रम्प की जीत और अपने यहां की नोटबंदी के लेकर कुछ ऐसा ही हुआ है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में उतरे हैं तो बार-बार खुद को चुटकी काटकर याद दिलाते रहना चाहिए कि हम धन के सबसे रिस्की ज़ोन में प्रवेश कर रहे हैं। घटनाएं बारम्बार हमें इस बात का अहसास कराती रहती हैं। लेकिन हम आसानी से उनके सबक भूल जाया करते हैं। किसको याद है कि 2009 में यूपीए सरकार की जीत के बाद भारतीय शेयर बाज़ार एक ही दिन में 17 प्रतिशत चढ़ गया था। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार समेत समूचे वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में कोई हारता है, तभी कोई जीतता है। कुछ लोगों का धन निकलकर दूसरों के पास जाता है। एक का नुकसान, दूसरे का फायदा होता है। हमें कोशिश यही करनी होती है कि हम हारने या गंवानेवाले खेमे में न रहे। लेकिन जब आकस्मिकताओं या बाज़ार के अपने स्वभाव के चलते भयंकर गिरावट का आलम हो, तब हमें क्या करना चाहिए? जबाव बेहद आसान है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

दो महीने पहले 7 सितंबर को 52 हफ्तों का शिखर छूनेवाला निफ्टी अब तक 7.5% गिर चुका है। संभव है कि दिसंबर में अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने से यह और गिर जाए। लेकिन इसी दौरान मजबूत शेयर कुलाचें मार रहे हैं। हम आज तथास्तु में जो कंपनी उठा रहे हैं, उसका शेयर जून में 60 के आसपास था। अभी 300 रुपए के करीब है। बाज़ार में सतह के नीचे की इन अंतर्धाराओं को पकड़ना ज़रूरी है।औरऔर भी

आप सामान्य ट्रेडर हैं, आपके पास पांच लाख रुपए से कम पूंजी है तो शेयर बाज़ार में शॉर्ट सौदों से परहेज़ करें। सुनने में बड़ा अच्छा लगता है कि कुशल ट्रेडर बाज़ार में उठने या गिरने, दोनों ही सूरत में कमाता है। लेकिन गिरने पर कमाना बड़ी पूंजीवालों के लिए ही संभव है। एक तो ऐसे सौदे डेरिवेटिव सेगमेंट में ही संभव हैं। दूसरे इंट्रा-डे में की जानेवाली मार्जिन ट्रेडिंग बहुत रिस्की है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बराबर बढ़ रहा शेयर जब मुनाफावसूली के चलते गिरता है, जिसे टेक्निकल शब्दावली में रिट्रैसमेंट कहते हैं, तब उसे खरीद लेना चाहिए। यहां ध्यान रखना पड़ता है कि उसमें पूरा रिट्रैसमेंट हुआ है या नहीं। इसमें हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए। जब वो संस्थाओं या प्रोफेशनल ट्रेडरों की खरीद से उठने लगे और इसकी पुष्टि भी हो जाए, तभी हमें उसे खरीदना चाहिए। हम यह भी पता लगाएं कि ब्रेकआउट ट्रेड क्या होते हैं। अब गुरु की दशादिशा…औरऔर भी

ज्यादा ट्रेडिंग वाली कंपनियों की संख्या भी सैकड़ों में होती है। हर दिन उनकी चाल को परखना अल्गोरिदम ट्रेड करने वाली संस्थाओं के लिए ही संभव है, आम ट्रेडरों के लिए नहीं। ऐसे में हमें दो-तीन साल से लगातार बढ़ रहे शेयरों की सूची बना लेनी चाहिए। इनमें से 40-50 ऐसी कंपनियां छांट लेनी चाहिए जिनका बिजनेस भी बराबर अच्छा चल रहा हो। बढ़ता शेयर मुनाफावसूली के बाद गिरे तो पकड़ लेना चाहिए। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

हमेशा के लिए एक बात गांठ बांध लें कि ट्रेडिंग में सफलता का मूल मंत्र है न्यूनतम रिस्क में अधिकतम लाभ कमाने की कोशिश। हर दिन लगभग 1700 कंपनियों में ट्रेडिंग होती है। हर किसी को आजमाने लगेंगे तो कोई फैसला ही नहीं कर पाएंगे। इसलिए ट्रेडिंग के लिए अमूमन वही कंपनियां चुननी चाहिए जिनमें ज्यादा कारोबार होता है। ऐसी कंपनी किसी न किसी सूचकांक में शामिल हो तो ज्यादा अच्छा है। अब पकड़ें मंगल की दृष्टि…औरऔर भी