बाज़ार ऐसी ऊंचाई पर है जहां बहुतों को डर लगता है कि कभी भी धराशाई हो सकता है। लेकिन कुछ ऑपरेटरों और संस्थाओं की खरीद बराबर जारी है और हर दिन सेंसेक्स व निफ्टी नया शिखर बना रहे हैं। लगता है कि अब सेंसेक्स को 40,000 तक पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। बस, 14-15% ही तो बढ़ना है। मुमकिन है कि बजट तक या उससे बाद यह कमाल-धमाल हो जाए। अब परखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार का अपना स्वभाव होता है और उस पर मानने या मनाने का कोई असर नहीं पड़ता। मगर, जिस तरह इस वक्त तमाम अच्छी कंपनियों के शेयर चढ़े हुए हैं, उसमें इच्छा होती है कि काश! वे जमकर गिर जाते तो हमें निवेश का सुरक्षित मौका मिल जाता। फिलहाल, इच्छाओं को परे रखकर हमें समय की शरण में चले जाना चाहिए और अच्छे शेयरों के गिरने का इंतज़ार करना चाहिए। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

अहम सवाल। कमज़ोर अर्थव्यवस्था के बीच लगातार चढ़ते बाज़ार में कैसे ट्रेड करें? एक तरीका यह है कि ट्रेडिंग से परहेज़ करें, कैश संभालकर रखें और चुनिंदा मजबूत कंपनियों में लंबे निवेश का मौका पकड़े। दूसरा तरीका यह है कि ट्रेडिंग की अवधि पांच-दस दिन से घटाकर दो-चार दिन की कर दें। तीसरा तरीका है कि पांच-दस आजमाई हुई कंपनियों में ही ट्रेड करें और बहुत ज्यादा उधर-उधर हाथ-पैर न फैलाएं। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बढ़ते बाज़ार में लहरों के हिसाब से नीचे आने पर खरीदने का सौदा बहुत कारगर नहीं होता। जब शेयर बराबर नया उच्चतम स्तर बना रहे हों, तब ब्रेकआउट ट्रेड ही सबसे कारगर रणनीति होती है। रोज़ाना के भावों के चार्ट पर उठते त्रिभुज का पैटर्न ब्रेकआउट की दस्तक देता है, लेकिन किसी भी हालत में ऊपर और नीचे आने की प्रायिकता 50:50 से बेहतर नहीं होती। मतलब ट्रेड करना बहुत-बहुत रिस्की होता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

जब बाज़ार चढ़ान पर हो तो गिरे हुए शेयरों में ट्रेड करना अक्सर घाटे का सौदा साबित होता है। यह अलग बात है कि कंपनी का बिजनेस मॉडल तगड़ा हो और वो हर कोण से मजबूत हो तो देर-सबेर उसके शेयर का बढ़ना तय है। ऐसा ही हाल इस समय तमाम फार्मा कंपनियों का है। लेकिन इनमें दीर्घकालिक निवेश करना ज्यादा लाभदायी होगा, जबकि ट्रेड करने पर फंसान हो सकती है। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

मानते हैं कि जो चढ़ा है, वह गिरेगा ज़रूर। लेकिन शेयर बाजार में यह धारणा पूरी तरह लागू नहीं होती। मजबूत कंपनियों के शेयर चढ़े तो चढ़ते चले जाते हैं, जब तक उनमें कोई बहुत खराब खबर नहीं आती। कमज़ोर कंपनियों के शेयर भी सटोरियो के हाथ से चढ़े तो गिरने में बहुत वक्त लगाते हैं। वहीं, कमज़ोर कंपनियों के शेयर गिरे तो गिरते चले जाते हैं। गिरा उठता नहीं, बढ़ा गिरता नहीं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार का हाल इस समय निराला है। हर दिन औसतन 150-200 कंपनियों के शेयर 52 हफ्ते का नया उच्चतम स्तर बना रही है तो मात्र 5-10 न्यूनतम स्तर। मसलन, शुक्रवार को एनएसई में 146 शेयरों ने नया शिखर बनाया तो केवल चार ने तलहटी पकड़ी, वो भी बेहद झंडू-झाप स्क्रिप्स ने। ऐसे में बड़ी मुश्किल है कि कौन-से शेयर पकड़े जाएं जिनमें बढ़ने की भरपूर गुंजाइश अभी बाकी हो। फिलहाल देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार या किसी भी वित्तीय बाज़ार में निवेश तभी करना चाहिए जब आप जितना लगा रहे हैं, उसे डुबाने के तैयार हों। कहने का यह बड़ा औघड़ अंदाज़ है। लेकिन कड़वी हकीकत यही है कि यह बाज़ार इतना रिस्की है कि आप जितना धन लगाते हैं, वह सारा का सारा डूब सकता है। इसलिए इसमें वही धन लगाएं जिसके डूबने पर आपके ठाट-बाट और सेहत पर कोई फर्क न पड़े। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में विदेशी संस्थाओं व एलआईसी से ज्यादा निवेश म्यूचुअल फंडों ने कर रखा है। म्यूचुअल फंडों में ज्यादातर रिटेल निवेशक ही नामा लगाते हैं। यह भी सच है कि वे जितनी तेज़ी से बाज़ार में घुसते हैं, उतनी ही तेज़ी से बाहर भी निकलते हैं। ज़रा-सी विपरीत हलचल उनमें घबराहट का तूफान पैदा कर देती है। विदेशी संस्थाएं तो ऋण-प्रपत्रों में सुरक्षित हैं। तब अकेली एलआईसी बाज़ार को कैसे बचा पाएगी? अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

कमोबेश सभी विशेषज्ञ मानते हैं कि साल 2018 में शेयर बाज़ार पिछले कुछ सालों जितना तेज़ नहीं रहने जा रहा। एक वजह तो यह है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक अब शेयरों से ज्यादा सरकारी या कॉरपोरेट ऋण को अहमियत देने लगे हैं। दूसरी वजह है कि मार्च से राज्यों के चुनावों का जो सिलसिला शुरू हो रहा है, वह राजनीतिक उहापोह पैदा कर सकता है। तीसरे, मोदी सरकार कठोर आर्थिक फैसलों से बचेगी। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी