शेयर बाज़ार की वोलैटिलिटी/चंचलता नापने के लिए आमतौर पर इंडिया वीआईएक्स सूचकांक का इस्तेमाल किया जाता है। वीआईएक्स की शुरुआत मूलतः शिकागो बोर्ड ऑफ एक्सचेंज (सीबीओई) ने बाज़ार में व्याप्त डर, घबराहट व अनिश्चितता को मापने के लिए 1993 में की थी। उसके बाद इसके फॉर्मूले को 2003 में अपडेट किया गया। भारत में एनएसई इसका इस्तेमाल सीबीओई के लाइसेंस के तहत करता है। इंडिया वीआईएक्स की गणना निफ्टी ऑप्शंस के वर्तमान और अगले महीने के भावोंऔरऔर भी

करीब साल भर पहले जब से शेयर बाज़ार को कोरोना का ज़ोर का झटका लगा है, तब से वो दिन में ज्यादा ही उछल-कूद मचाने लगा है। पहले निफ्टी-50 दिन भर में 80-100 अंकों का चक्कर काटता था। लेकिन अब वो औसतन 200-350 अंक ऊपर-नीचे होता है। मसलन, शुक्रवार को निफ्टी-50 का दायरा 250 अंकों का रहा है। इसे तकनीकी भाषा में ‘वोलैटिलिटी’ कहते हैं। बाज़ार के लिए इतनी ज्यादा दैनिक वोलैटिलिटी कोरोना के झटके ससे उभरीऔरऔर भी

कुछ लोगों के पास बहुत सारा सस्ता धन आता जा रहा हो और आर्थिक गतिविधियां ठहरी पड़ी हों तो वह धन उत्पादक कामों में लगने के बजाय सटोरिया गतिविधियां में लग जाता है। अमेरिका, यूरोप व जापान जैसे देशों से निकलता ऐसा लगभग शून्य ब्याज वाला धन पिछले दिनों बिट-कॉयन जैसी क्रिप्टो मुद्राओं में सट्टेबाज़ी करने लगा। वहां एकबारगी झटका लगा तो कोरोना की दूसरी लहर के बावजूद वह पलटकर दोबारा भारत जैसे शेयर बाज़ारों की तरफऔरऔर भी

दो साल से जारी कोरोना संकट का सबक सरकारों से लेकर समाज, अर्थव्यवस्था और अवाम के लिए यकीनन अलग-अलग हो सकता है। लेकिन हर खास-ओ-आम के लिए सोचने-समझने की बात है कि ऐसा क्या है जिसने सारा चक्का जाम कर दिया। पूंजी का बहना जारी है। लग रही है, निकल रही है। शेयर बाज़ार झमाझम। बिक्री और रोजमर्रा की खपत जारी है। मशीनें सलामत हैं, फैक्ट्रियां बरकरार है। रुका है तो जन और श्रम का प्रवाह। श्रमिकऔरऔर भी

देश में सालोंसाल से स्वास्थ्य पर केंद्र सरकार का खर्च 1.15% जीडीपी पर अटका है, जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने कई साल पहले इसे 2.5% करने का वादा किया था। राज्यों का भी खर्च मिला दें तो स्वास्थ्य सेवा पर हमारा कुल सरकारी खर्च जीडीपी का 3.6% बनता है, जबकि चीन इन सेवाओं पर जीडीपी का 5%, ब्राज़ील 9.2%, जापान 10.9% और जर्मनी 11.2% खर्च करता है। वहीं, विश्व का औसत 6.1% जीडीपी का है। कोरोना काल तकऔरऔर भी

ठीक तीन महीने पहले इसी साल 28 जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम के वीडियो संबोधन में अपनी वाहवाही करते हुए कहा था कि दुनिया के विशेषज्ञों व संस्थाओं ने भविष्यवाणी की थी कि “भारत में कोरोना की सुनामी आएगी। लेकिन भारत प्रो-एक्टिव पब्लिक पार्टिसिपेशन के एप्रोच के साथ आगे बढ़ता रहा। हमने कोरोना के खिलाफ लड़ाई जनांदोलन में बदल दी। आज भारत दुनिया के उन देशों में से है जो अपने ज्यादा से ज्यादाऔरऔर भी

भारत की स्थिति किसी गरीब अफ्रीकी मुल्क जैसी हो गई है। कोरोना के मरीज पांच दिन से लगातार नया रिकॉर्ड बना रहे हैं। ब्रिटेन, जर्मनी व अमेरिका से लेकर यूनिसेफ जैसी संस्थाएं भारत को मेडिकल मदद देने को उत्सुक हैं। आखिर, इस साल के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्वास्थ्य आवंटन 137% बढ़ाकर 2,23,846 करोड़ रुपए कर दिया तो स्वास्थ्य सेवाओं व अस्पतालों की स्थिति इतनी बदतर व दयनीय क्यों? दरअसल, वित्त मंत्री ने झूठऔरऔर भी

शेयर बाज़ार देश में कोरोना की दूसरी लहर को न जाने कब जज्ब करना शुरू करेगा! लेकिन रेटिंग एजेंसियों ने भारत की अर्थव्यवस्था पर इसके ऋणात्मक असर का आकलन शुरू कर दिया है। इंडिया रेटिंग्स ने चालू वित्त वर्ष 2021-22 में हमारे जीडीपी की वास्तविक विकास दर का अनुमान 10.4% से घटाकर अब 10.1% कर दिया है। अभी तक के हिसाब-किताब के मुताबिक बीते वित्त वर्ष 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था बढ़ने के बजाय 7.6% घटी है। इसलिएऔरऔर भी

कोरोना वायरस ने साल भर से हड़कम्प मचा रखा है। लेकिन बहुत हुआ तो वायरस कई म्यूटैंट बनाने के बावजूद साल-दो साल में खत्म हो जाएगा। नाकारा व संवेदनहीन सरकार हुई तो देश में ज्यादा लोग, ज्यादा तकलीफ से मरेंगे और अर्थव्यवस्था को ज्यादा चोट लगेगी। वहीं, अच्छी व संवेदनशील सरकार हुई तो कम लोग कम तकलीफ से मरेंगे और अर्थव्यवस्था को कम चोट पहुंचेगी। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटेगी। अच्छीऔरऔर भी

तय मानकर चलें कि भारतीय शेयर बाज़ार का गुब्बारा किसी देशी घटनाक्रम से नहीं फूटेगा। ग्लोबल हो चुके बाज़ार में इसका स्रोत बाहरी होगा। अंदर तो हमारे समूचे तंत्र की इलास्टिक खींच-खींचकर इतनी ढीली कर दी गई है कि प्रधानमंत्री के खिलाफ घनघोर भ्रष्टाचार का महाभियोग भी खिसककर नीचे गिए जाएगा। बाहर से बाज़ार को जोर का झटका भयंकर उधारी का तंत्र टूटने पर लग सकता है। इस समय हालत यह है कि एक डॉलर लगाकर 500औरऔर भी