दूसरे सरकारी नेताओं को तो छोड़िए, हमारे वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी तक दबी जुबान से कहते रहे हैं कि खाने-पीने की चीजों के महंगा हो जाने की एक वजह लोगों की बढ़ी हुई क्रयशक्ति है। खासकर महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गांरटी जैसी योजनाओं के चलते गरीब लोगों की तरफ से खाद्यान्नों की मांग बढ़ गई। वे पहले से ज्यादा खाने लगे हैं जिसका असर खाद्य मुद्रास्फीति के बढ़ने के रूप में सामने आया है। लेकिन रिजर्व बैंकऔरऔर भी

अमेरिका भारत के कृषि क्षेत्र में घुसने की हरसंभव कोशिश कर रहा है और भारतीय कृषि बाजार को खुलवाने के लिए वह कानूनी रास्ते भी तलाश रहा है। खासकर वह चाहता है कि भारत अपने डेयरी क्षेत्र और बाजार को विदेशी निवेश व उत्पादों के लिए खोल दे। यह किसी और का नहीं, बल्कि खुद अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि रॉन किर्क का कहना है। रॉन किर्क ने गुरुवार को अमेरिकी सीनेट में सांसदों को बताया कि, “हमऔरऔर भी

कृषि, खाद्य व उपभोक्ता मामलों के मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के अध्यक्ष शरद पवार ने शुक्रवार को संसद में ऐसा बयान दिया जिससे लगता है कि अगर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के चहेते खाद्य सुरक्षा विधेयक को कानून बना दिया गया तो देश राजकोषीय घाटे के दलदल में घंस जाएगा। उन्होंने कहा कि खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत अगर गरीब परिवारों को महीने में 25 किलो अनाज दिया जाता है तो सरकार को 76720 करोड़औरऔर भी

सरकार ने किसानों को रियायती ब्याज दर पर ऋण मुहैया कराने के लिए अपने खजाने से 4868 करोड़ रुपए निकालने का निर्णय लिया है। यह रकम सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और को-ऑपरेटिव बैंकों के साथ-साथ नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक) को भी दी जाएगी। नाबार्ड क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और को-ऑपरेटिव बैंकों को रीफाइनेंस करता है। यह निर्णय शुक्रवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में लिया गया। मंत्रिमंडल के इस फैसले से यहऔरऔर भी

जलवायु परिवर्तन के नुकसान ही नहीं फायदे भी हैं। कृषि क्षेत्र के जानकारों का दावा है कि भारत में खेती को इसका फायदा मिला है। वैश्विक स्तर पर गेहूं व चावल जैसे अनाज की पैदावार में बढ़ोतरी हुई है तो उसके पीछे जलवायु परिवर्तन का भी हाथ है। इस संबंध में हुए अध्ययन से यह तथ्य भी सामने आया है कि देश के कई हिस्सों का औसत तापमान बढ़ा तो कुछ जगहों पर घटा भी है। कृषिऔरऔर भी

भारत अब कृषि-प्रधान देश नहीं रहा। आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि क्षेत्र का योगदान मैन्यूफैक्चरिंग से कम है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक 2009-10 के जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का योगदान 7,19,975 करोड़ रुपए (16.1%) है, जबकि कृषि, वानिकी व फिशिंग का योगदान 6,51,901 करोड़ रुपए (14.6%) है। लेकिन उद्योग के बढ़ने के बावजूद वहां रोजगार के अवसर नहीं बढ़े हैं। कृषि पर निर्भर आबादी 70औरऔर भी

किसी भी पैमाने से देखें तो देश में अभी चल रही मुद्रास्फीति की दर काफी ज्यादा है। यह चिंता की बात है क्योंकि इससे एक नहीं, कई तरह की दिक्कतें पैदा होती हैं। खासकर आबादी के बड़े हिस्से के लिए जिसके पास इसके असर को काटने के लिए कोई उपाय नहीं है। पहली बात कि मुद्रास्फीति आपके पास जो धन है, उसकी क्रय क्षमता को कम कर देती है। इससे बंधी-बंधाई आय और पेंशनभोगी लोगों का जीवनऔरऔर भी