एक हम ही तुर्रमखां नहीं हैं यह काम करनेवाले। दूसरे भी बहुत-से हैं जो इसी वक्त यह काम बड़ी शिद्दत से कर रहे होंगे। यह सोच एक तो हमारा गुमान तोड़ती है। दूसरे अकेलेपन की घबराहट भी मिटा देती है।और भीऔर भी

फूल तो गुलाब भी है और बेला भी। अलग हैं लेकिन एक भी। यह भिन्नता प्रकृति व समाज दोनों में अपरिहार्य है। जो इसे तोड़कर एकसार बनाना चाहते हैं, वे समाज ही नहीं, प्रकृति के भी अपराधी हैं।और भीऔर भी

जब आप एक ध्येय के साथ संघर्ष कर रहे होते हो, तब दरअसल आप अपने अंदर एक पात्रता पैदा कर रहे होते हो। इस पात्रता में इतना दम होता है कि समर्थन खुद ब खुद आपकी तरफ दौड़ा चला आता है।और भीऔर भी

अंदर की प्रकृति को बाहर की प्रकृति से मिला देना, प्रकृति के साथ एकाकार हो जाना ही लक्ष्य है। सत्ता और समाज अपने-आप में साध्य नहीं, बल्कि साधन हैं प्रकृति की विपुल संपदा में अपना हिस्सा पाने के।और भीऔर भी

कोई भी फर्क मामूली नहीं। ज़रा-सा फर्क मूल प्रकृति बदल देता है। कोशिका के 46 में से एक क्रोमोज़ोम के अंतर से पुरुष स्त्री बन जाता है। इसलिए बारीक अंतरों को कतई नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए।और भीऔर भी

हमारे अंदर-बाहर हर वक्त जड़ता व गतिशीलता के बीच संघर्ष चलता रहता है। लड़कर खड़े नहीं हुए तो जड़ता खींचकर बैठा देती है। भ्रम और पूर्वाग्रह जड़ता के सहचर हैं, जबकि ज्ञान-विज्ञान गतिशीलता के।और भीऔर भी

रेत में सिर डालकर शुतुरमुर्ग की तरह जीने व शिकार हो जाने का क्या फायदा! इस दुनिया में अनगिनत शक्तियां सक्रिय हैं। यहां ‘एक मैं और दूजा कोई नहीं’ की सोच नहीं चलती। यह सरासर गलत है।और भीऔर भी

हमें हर काम को रूटीन नहीं, एकदम नया समझकर करना चाहिए ताकि दिमाग पूरी तरह उसमें रम जाए। यह नहीं कि यंत्रवत साइकिल चलाए जा रहे हैं और दिमाग का सचेत हिस्सा सोया पड़ा हुआ है।और भीऔर भी

विचारों को बाहर से ट्रांसप्लांट नहीं किया जा सकता है। उसी तरह, जैसे हम किसी पौधे में ऊपर से फूल नहीं टांक सकते। फूल तो पौधे की जटिल संरचना के भीतर से ही निकलते हैं, कहीं से टपकते नहीं।और भीऔर भी

काम अपने लिए करने जाते हैं, पर करना दूसरों के लिए पड़ता है तो धीरे-धीरे हम खुद ही निर्वासित हो जाते हैं। फिर जो है, उसे बचाने के चक्कर में निर्वासन खिंचता जाता है और ज़िंदगी ही चुक जाती है।और भीऔर भी