निर्वासित

काम अपने लिए करने जाते हैं, पर करना दूसरों के लिए पड़ता है तो धीरे-धीरे हम खुद ही निर्वासित हो जाते हैं। फिर जो है, उसे बचाने के चक्कर में निर्वासन खिंचता जाता है और ज़िंदगी ही चुक जाती है।

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