निवेश का अपना-अपना नज़रिया। सभी लॉन्ग टर्म की बात करते हैं। लेकिन लॉन्ग टर्म मतलब कितना? कहते हैं कि कोई शेयर दस साल नहीं रखना तो दस मिनट भी न रखें। असल बात है आपकी होल्डिंग क्षमता, जरूरत और लक्ष्य। जैसे, साल भर पहले 160 पर तीन साल में 235 तक पहुंचने लक्ष्य के साथ खरीदने को कहा गया पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन 90% बढ़कर 304 पर पहुंच गया है तो बेचकर निकल लें। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी

पाप का घड़ा कब भरता है, पता नहीं। लेकिन बिजनेस चैनलों के एनालिस्टों और एंकरों के पाप बढ़ते जा रहे हैं। जिस निवेशक को जागरूक करने की बात करते हैं, डीलिंग-सेटिंग करके वे उसका ही शिकार करवाते हैं। सीएनबीसी के एक ऐसे ही स्टार एंकर अकूत कमाई के बाद फिलहाल आराम फरमा रहे हैं। अफसोस कि ‘आवाज़’ में भी ऐसी हाथ-सफाई चल रही है। इन चैनलों का शिकार होने से बचें। आज तथास्तु में एक लार्जकैप कंपनी…औरऔर भी

बढ़ने का नाम ज़िंदगी। जो ठहरा, वो निपटा। कंपनियों पर भी यह बात बराबर लागू होती है। धंधा लगातार बढ़े तो उसके शेयर चढ़ते हैं। किसको पता था कि फरवरी 1993 में 95 पर जारी इनफोसिस के शेयर इक्कीस साल बाद 4150 तक जानेवाले हैं। वो भी पांच बार 1:1 और एक बार 3:1 में बोनस शेयर के बाद। इसलिए यहां महंगा सस्ता 52 हफ्ते के उच्चतम/न्यूनतम से नहीं तय होता। तथास्तु में एक और संभावनामय कंपनी…औरऔर भी

उम्मीदें बनती हैं कि आनेवाले पांच-दस साल में कंपनी जमकर मुनाफा कमाएगी। वो उसके शेयर भाव में जज्ब हो जाती है। इसी तरह समग्र रूप से देश की अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक विकास की उम्मीद बनती है तो शेयर बाज़ार चढ़ जाता है। इससे कंपनियों के बाज़ार मूल्य और उन्हें फिर से बनाने की लागत में अंतर आ जाता है तो नए निवेश को प्रेरणा और अल्पकालिक विकास को गति मिलती है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

एफडी में धन लगाते हैं तो मकसद से। सोना खरीदते हैं तो मकसद से। लेकिन शेयर बाज़ार से या तो डरकर भागते हैं या सोचते हैं कि यहां धन को दोगुना-चौगुना दस गुना करना है। शेयरों में निवेश का यह नज़रिया सरासर गलत है। हमें शेयरों में निवेश हमेशा मकसद से जोड़कर करना चाहिए। लक्ष्य पूरा तो बगैर ज्यादा लालच किए बेचकर मकसद के लिए सुरक्षित एफडी या अन्य माध्यम में रख दिया। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी

नाम और साख बनाने में सालों लग जाते हैं। इसलिए धंधे में नाम या ब्रांड की बड़ी अहमियत है। लेकिन निवेश करते वक्त केवल नाम के पीछे भागना नुकसानदेह हो सकता है। विजय माल्या और किंगफिशर जैसे किस्से बड़े आम हैं। इसलिए नामी कंपनियों की हकीकत समझने के बाद ही फैसला करें। नाम कभी-कभी कंपनी के संकट से निकलने का भरोसा दिलाता है तो अक्सर भ्रम भी पैदा कर देता है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

इंसान की न इच्छाओं का अंत है और न ज़रूरतों का। इसीलिए इन्हें पूरा करने में लगी नई-नई कंपनियों के आने का भी कोई अंत नहीं। जो व्यापक लोगों की ज़रूरत को जितना बेहतर पूरा करती है, वो उतनी ही सफल कंपनी बन जाती है। उपयोगी चीज़ बनाती है, जीवन में मूल्य जोड़ती है तो लोग भी उसे दाम देकर बढ़ाते जाते हैं। नतीज़तन उसके स्वामित्व/शेयर का मूल्य बढता जाता है। तथास्तु में ऐसी ही मूल्य-युक्त कंपनी…औरऔर भी

हर कोई बेहतरीन खाना नहीं बना सकता, लेकिन अच्छे खाने की तारीफ तो हर कोई कर सकता है। इसी तरह हर कोई अच्छा बिजनेस नहीं चला सकता। लेकिन कौन-सा बिजनेस अच्छा है, कहां मार्जिन ज्यादा है, संभावना अधिक है, यह बात दिमाग पर थोड़ा-सा ज़ोर लगाकर कोई भी समझ सकता है। शेयर बाज़ार में निवेश करना है तो यही समझना पड़ता है। हम बस इतना कर लें तो बाकी काम कंपनी कर डालेगी। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी

ठीक तीन साल पहले 5 अक्टूबर 2011 हमने डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज़ में निवेश की सलाह दी थी। तब उसका पांच रुपए अंकित मूल्य का शेयर 1450 रुपए पर था। पांच रुपए का वही शेयर अभी 3210 रुपए पर चल रहा है। तीन साल में निवेश का 2.21 गुना हो जाना चमत्कार नहीं। यह है बढ़ती कंपनी के साथ आपके स्वामित्व के मूल्य का बढ़ते जाना। तथास्तु में एक और संभावनामय कंपनी जहां उड़ेगा आपका निवेश पंख लगाकर…औरऔर भी