सरकारी बांडों या बैंकों की एफडी में निवेश सुरक्षित माना गया है क्योंकि उनका वास्ता सरकार की नीति, देश की आर्थिक स्थिति, रिजर्व बैंक और मौद्रिक नीति से होता है। हालांकि इनमें से भी रिस्क होता है। पर दुनिया भर में सरकार से जुड़े प्रपत्रों को रिस्क-मुक्त माना जाता है। वहीं, जब हम किसी कंपनी में निवेश करते हैं तो उसका बढ़ना-घटना उसके अपने कामकाज़ से जुडा होता है। आज तथास्तु में पेश है एक सरकारी कंपनी…औरऔर भी

शेयरों में निवेश से हमें एक नहीं, दो फायदे मिलते हैं। दिक्कत यह है कि अमूमन हम यही सोचते हैं कि जिस भाव पर खरीदा है, उससे कुछ साल बाद हमें ज्यादा भाव मिल जाएगा, कम से कम इतना कि मुद्रास्फीति का असर मिटा देगा। लेकिन दूसरा फायदा भी उतना ही महत्वपूर्ण है जो हमें बतौर लाभांश मिलता है। इसलिए हमें कंपनी के लाभांश-रिकॉर्ड को भी तरजीह देनी चाहिए। आज तथास्तु में  लाभांश देनेवाली एक मजबूत कंपनी…औरऔर भी

हर शेयर के पीछे एक कंपनी होती है जिसके पीछे उसके प्रवर्तक व प्रबंधन टीम होती है। इनका लक्ष्य होता है मुनाफे को अधिकतम करते जाना। लेकिन इसके लिए वे कहीं लूटमार नहीं करते, बल्कि नया मूल्य-सृजन करते हैं जो देश की अर्थव्यवस्था में जुड़कर मुद्रा के रूप में बहता है। बाज़ार इस मूल्य को समझकर सही भाव देता है और शेयरधारक बनकर हम उसका फायदा उठाते हैं। यही है निवेश। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

एनालिस्टों का कौआरोर जारी है कि अभी बाज़ार जितना गिर चुका है, वहां दीर्घकालिक निवेश का अच्छा मौका है। लेकिन बताते नहीं कि जंगल में आखिर किसी पेड़ को पकड़ें क्योंकि जंगल तो अमूर्त है। फिर सवाल उठता है कि क्या हर गिरा हुआ शेयर निवेश के काबिल है? याद रखें, हर सस्ता शेयर अच्छा नहीं होता। मुमिकन है कि कोई शेयर गिरने के बावजूद औकात से ज्यादा बमक रहा हो। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

उपभोक्ता की तेल, साबुन व पेस्ट जैसी रोजमर्रा की ज़रूरतें हमेशा बनी रहनी हैं तो एफएमसीजी कंपनियों का धंधा कभी मंदा नहीं पड़ता। गरीब से गरीब इंसान भी दवाओं व इलाज पर खर्च में कोताही नहीं बरतता तो दवा कंपनियों का धंधा भी सदाबहार चलता है। इसी तरह उन कंपनियों का धंधा भी बराबर चौकस रहता है जो आम उपभोक्ता को नहीं, बल्कि उद्योगों को सीधे अपना माल बेचती हैं। तथास्तु में आज ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी

स्मॉल-कैप कंपनियों के शेयर जमकर उछलते हैं तो गिरते भी हैं उतनी ही तेज़ी से। वहीं, मिड-कैप कंपनियों के साथ भी कमोबेश यही होता है। लेकिन मजबूत लार्ज-कैप कंपनियां अगर सही भाव पर पकड़ ली जाएं तो उनमें धीमी ही सही, मगर निरतंर वृद्धि होती रहती है। आज तथास्तु में ऐसी ही एक लार्ज-कैप कंपनी जिसके शेयर बीते तीन महीनों में 21% गिर चुके हैं। अभी इसमें निवेश करना लंबे समय में काफी लाभकारी साबित होगा।…और भीऔर भी

उद्योग में संभावना हो, कंपनी मजबूत हो, प्रबंधन अच्छा हो तो उसके शेयर हम कई बार थोड़ा-थोड़ा खरीद सकते हैं। पिछले एक-दो महीने में इसी कॉलम में बताई गई कुछ कंपनियों के शेयर गिरे हैं तो घबराने के बजाय उन्हें थोड़ा और खरीद लेना चाहिए। वहीं, जो कंपनी अपने अंतर्निहित मूल्य से ज्यादा भाव पर ट्रेड हो रही हो, उसके थोड़े शेयर अभी खरीदने चाहिए और बाकी बाद में। आज तथास्तु में ऐसी ही एक चढ़ी कंपनी…औरऔर भी

पांच साल पहले जब मैंने ‘मल्टी-बैगर’ शब्द सुना तो न कुछ समझ में आया, न ही किसी ने समझाया। बाद में पता चला कि इसका सीधा-सा मतलब है कई गुना बढ़नेवाले शेयर। प्रायः ये स्मॉल-कैप कंपनियों के शेयर होते हैं। दिक्कत यह है कि ऐसे शेयर हफ्तों में आसमान छू लेते हैं, लेकिन दिनों में ही पाताल तक लुढ़क जाते हैं। इसलिए इनके चुनने में बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है। आज तथास्तु में एक संभावनामय स्मॉल-कैप कंपनी…औरऔर भी

बराबर रिटर्न कमाते-कमाते अक्सर भ्रम हो जाता है कि शेयर बाज़ार में रिस्क ही नहीं। अगर है तो हम उस्ताद जो ठहरे! इस भ्रम को तोड़ दिया बीते हफ्ते बुधवार ने, जब सेंसेक्स 2.63% और निफ्टी 2.74% लुढ़क गया, वो भी सिंगापुर में हुई अल्गोरिदम ट्रेडिंग के चलते। याद रखें कि ग्लोबल हो जाने से शेयर बाज़ार में निवेश/ट्रेडिंग का रिस्क घटने के बजाय बढ़ गया है। आज तथास्तु में ऐसी कंपनी जिसमें रिस्क थोड़ा ज्यादा है…औरऔर भी

लुभावने बहकावे में न आएं तो शेयर बाज़ार से कमाना कोई रॉकेट साइंस नहीं। ट्रेडिंग भावनाओं और प्रायिकता को पकड़ने का खेल है जबकि निवेश कंपनी की संभावनाओं को पकड़ने का। जैसे, टीवीएस मोटर को ठीक चार साल पहले हमने 56.35 पर पकड़ा था। अभी चार गुना होकर 235.65 पर है। दिक्कत यह है कि यहां कुछ लोग दूसरों को चरका पढ़ाने का धंधा करते हैं। खैर, सेबी उनकी धरपकड़ में लगी है। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी