सही व काम की शिक्षा पर किया गया खर्च कभी बेकार नहीं जाता। वो तो निवेश की तरह है जिसमें अभी उठाई गई थोड़ी-सी तकलीफ बाद में बड़े आराम का आधार बन जाती है। इसलिए शिक्षा को कभी उपभोग नहीं, हमेशा निवेश मानना चाहिए।और भीऔर भी

कल जो हुआ, सो हुआ। कल क्या होगा, चिंता इसकी है। कारण, करने व सोचने का तरीका एकदम सही होने के बावजूद हम गलत साबित हो सकते हैं क्योंकि हम अतीत को नहीं, बल्कि भविष्य को साध रहे होते हैं और भविष्य में हमेशा रिस्क होता है।और भीऔर भी

चीजें जो कल थीं, आज नहीं हैं। आज जैसी हैं, वैसी कल नहीं रहेंगी। परिवर्तन का यही नियम है। यही जीवन है। इसलिए कल से चिपके रहने या आज को लेकर रोते रहने का कोई मतलब नहीं। सबक लो, बढ़ते चलो। यही सही है और उचित भी।और भीऔर भी

जो लोग देखने से ही मना कर देते हैं, उनके फैसले कैसे सही हो सकते हैं? तथ्यों से सत्य और सत्य से सूत्र निकलते हैं। पहला चरण है तथ्यों की तहकीकात। जो इससे भागते हैं, उनके सूत्र सरासर बकवास हैं।और भीऔर भी

अतीत से चिपके रहे तो वर्तमान को ठीक से नहीं जी सकते। अतीत को ठुकरा दिया, तब भी वर्तमान को ठीक से नहीं जी सकते क्योंकि अतीत ही हमें अपने कर्मों के सही-गलत होने का भान कराता है।और भीऔर भी

अंश-अंश में सब सही। पर संपूर्ण आते ही भ्रम में पड़ जाते हैं कि आखिर कौन है सही, क्या है सही? बीच में झूलेंगे तो हमेशा भ्रमित रहेंगे, जबकि कोई पाल्हा पकड़ लेंगे तो सारा भ्रम भूत की तरह भाग जाएगा।और भीऔर भी

आदर्श हालात या आदर्श अवसर जैसी कोई चीज व्यवहार में नहीं होती। जो इसकी बाट जोहते हैं, वे मंजिल तक पहुंचना तो दूर, चल ही नहीं पाते। इसलिए थोड़ा कम की आदत डाल लेना ही सही है।और भीऔर भी

हम किसी को या तो पूरा सही मान लेते हैं या एकदम खारिज कर देते हैं। या तो हां या न। खटाखट नतीजों पर पहुंचने की जल्दी में रहते हैं हम। लेकिन खुद के विकास के लिए यह अतिवादी ढर्रा ठीक नहीं है।और भीऔर भी

खुद कोई अपने संदर्भ में कैसे गलत हो सकता है? नाक कैसे बता सकती है कि वह टेढ़ी है? दूसरों का संदर्भ ही बताता है कि हम सही हैं या गलत। इसलिए, खुद को हमेशा दूसरों के नजरिए से देखना चाहिए।और भीऔर भी

किसी दिन कोई हमें बता देता है कि यह सही है और वह गलत। हम उसका ज्ञान ओढ़ लेते हैं। धीरे-धीरे हमारा आचार-विचार यंत्रवत हो जाता है। और, यंत्रवत होते ही हम इंसान के सत्व से हाथ धो बैठते हैं।और भीऔर भी