ब्याज से छेड़छाड़ नहीं, पर सीआरआर में हो सकती है आधा फीसदी कटौती

मुद्रास्फीति को लेकर रिजर्व बैंक कुछ हद तक निश्चिंत हो गया है। लेकिन इतना नहीं कि मौद्रिक नीति की तीसरी तिमाही में ब्याज दरों में कटौती कर दे। मंगलवार को सुबह 11 बजे रिजर्व बैंक नए मौद्रिक उपायों की घोषणा करने जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक मुद्रा बाजार में इस समय जिस तरह तरलता की किल्लत चल रही है, उसमें पूरे आसार इस बात के हैं कि वह नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में आधा फीसदी कटौती कर देगा। इस समय सीआरआर 6 फीसदी है, जिसे घटाकर 5.5 फीसदी किया जा सकता है। सीआरआर बैंकों की जमा का वह हिस्सा है जिसे उन्हें रिजर्व बैंक के पास रखना पड़ता है। हल्की-सी संभावना इस बात की है कि वह सीआरआर के रूप जमा बैंकों के धन पर करीब पांच साल बाद फिर से ब्याज देना शुरू कर सकता है।

सोमवार को जारी आर्थिक व मौद्रिक स्थितियों की आकलन रिपोर्ट में रिजर्व बैंक का कहना है, “नवंबर 2011 के बाद से मुद्रा बाजार में तरलता की स्थिति काफी कस गई है जिसकी आंशिक वजह रुपए को उठाने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा की गई डॉलर की बिक्री है। तरलता के दबाव को रिजर्व बैंक ने चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ) के तहत रेपो सुविधा के साथ-साथ खुली बाजार गतिविधि (ओएमओ) के जरिए कम किया है।” रिजर्व बैंक ओएमओ के तहत बैंकों से सरकारी बांडों को खरीदकर सिस्टम में नकदी या तरलता डालता है।

लेकिन हकीकत यह है कि रिजर्व बैंक की इन सहूलियतों के बावजूद बैंकों के लिए तरलता की स्थिति सुधरी नहीं है। इस महीने अब तक बैंक रेपो सुविधा के तहत रिजर्व बैंक से हर दिन औसतन 1.26 लाख करोड़ रुपए उधार लेते रहे हैं। आज सोमवार, 23 जनवरी को तो उन्होंने रेपो के तहत 1.42 लाख करोड़ रुपए उधार लिये हैं। रिजर्व बैंक के लिए सामान्य स्थिति यह होती है कि बैंक अपनी जमा का एक फीसदी उससे सुधार लें। बैंकों की कुल जमा 30 दिसंबर 2011 तक 58,27,910 करोड़ रुपए रही है। इस लिहाज से ठीकठाक स्थिति यह होगी कि वे कुल मिलाकर रिजर्व बैंक से करीब 60,000 करोड़ रुपए उधार लें। लेकिन वास्तविक आंकड़ा बराबर इसका दोगुना चल रहा है।

यही नहीं, कॉल मनी बाजार में बैंकों को 9 फीसदी या इससे ज्यादा ब्याज पर उधार मिल रहा है, जैसे आज कॉल मनी दर 7 से 9.06 फीसदी रही है, जबकि इस दर को रिवर्स रेपो (7.5 फीसदी) और रेपो दर (8.5 फीसदी) के दायरे में होना चाहिए। बता दें कि रिजर्व बैंक रेपो दर पर सिस्टम में नकदी डालता है, जबकि रिवर्स रेपो दर पर वह बैंकों की अतिरिक्त नकदी सोख लेता है। बैंकों को रेपो के तहत रिजर्व बैंक से उधार लेने के लिए सरकारी बांड बतौर जमानत देने पड़ते हैं। इसलिए बैंकों ने सरकारी बांडों में निर्धारित एसएलआर (संवैधानिक तरलता अनुपात) से ज्यादा निवेश कर रखा है। इस समय एसएलआर 24 फीसदी है। लेकिन एसएलआर में बैंकों का समग्र निवेश 29 फीसदी के आसपास चल रहा है। बैंकों का एसएलआर निवेश किसी भी हालत में 23 फीसदी से कम नहीं हो सकता। कम एसएलआर वाले बैंक रिजर्व बैंक की मार्जिनल स्टैंडिंग सुविधा (एमएसएफ) के तहत उससे 9.5 फीसदी सालाना ब्याज पर उधार लेते हैं।

सिस्टम में तरलता की स्थिति इसलिए भी सिकुड़ गई है क्योंकि रुपए को संभालने के लिए रिजर्व बैंक को बाजार में डॉलर डालने पड़े हैं। एक अनुमान के मुताबिक उसने दिसंबर 2011 तक बाजार में करीब 800 करोड़ डॉलर डाले हैं। 13 जनवरी 2012 को खत्म हफ्ते में ही हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में 101.65 करोड़ डॉलर की कमी आई है। हो सकता है कि इसका बड़ा हिस्सा रुपए को उठाने के लिए किया गया हस्तक्षेप हो। नोट करने की बात है कि सिस्टम में जितने डॉलर डाले जाते हैं, उसके बराबर रुपया रिजर्व बैंक को खींचना पड़ता है। इस हिसाब से रुपए को संभालने के लिए ही पिछले कुछ महीनों में रिजर्व बैंक करीब 45,000 रुपए सिस्टम से सोख चुका है।

इसको बराबर करने के लिए उसने ओएमओ के जरिए सरकारी बांड खरीदकर सिस्टम में अभी तक 71,878 करोड़ रुपए डाले हैं। लेकिन इससे तरलता का संकट हल्का नहीं पड़ा है। इसका सबूत है कि बैंकों ने मौद्रिक नीति की तीसरी त्रैमासिक समीक्षा के ठीक एक दिन पहले रिजर्व बैंक से रेपो के तहत कुल 1,41,770 करोड़ रुपए उधार लिये हैं। रिजर्व बैंक के सामने इस दबाव को हल्का करने की चुनौती है। इसलिए बहुत संभावना इस बात की है कि वह सीआरआर में कम से कम आधा फीसदी की कमी कर देगा। इससे बैंकों को करीब 30,000 करोड़ रुपए की अतिरिक्त तरलता मिल जाएगी। बता दें कि फरवरी 2010 से रेपो व रिवर्स रेपो दर में 5.25 फीसदी और सीआरआर में एक फीसदी की वृद्धि की जा चुकी है।

एक और दूर की कौड़ी है कि रिजर्व बैंक बैंकों द्वारा जमा कराए गए सीआरआर पर ब्याज देने की पेशकश कर सकता है। गौरतलब है कि रिजर्व बैंक 13 अप्रैल 2007 के बाद से बैंकों को सीआरआर पर कोई ब्याज नहीं देता। इससे पहले वह इस पर 3.5 फीसदी तक ब्याज दिया करता था। अगर सीआरआर पर वह ब्याज देना शुरू करता है तो इससे बैंकों के लिए धन की लागत कम हो जाएगी, भले ही सांकेतिक रूप से। लेकिन इसकी संभावना न के बराबर है क्योंकि यह काम संसद में संशोधन विधेयक लाकर ही किया जा सकता है।

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