दस साल बाद भी बीमा में सरकारी का दबदबा, निजी कंपनियों का धंधा घटा

बीमा कारोबार को निजी क्षेत्र के लिए खोले हुए दस साल से ज्यादा हो चुके हैं। लेकिन साधारण बीमा ही नहीं, जीवन बीमा तक में अभी तक सरकारी कंपनियों का दबदबा है। बीमा नियामक संस्था, आईआरडीए (इरडा) की तरफ से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष 2011-12 में अप्रैल से दिसंबर तक के नौ महीनों में जहां साधारण बीमा में मिले प्रीमियम का 58.3 फीसदी सरकारी कंपनियों की झोली में गया है, वहीं जीवन बीमा में कुल जमा प्रीमियम का 72.3 फीसदी अकेले एलआईसी के खाते में आया है। जानकारों का कहना है कि इससे स्पष्ट होता है कि निजी कंपनियों आम ग्राहकों का भरोसा एक दशक बाद भी नहीं जीत पाई हैं।

यही नहीं, जीवन बीमा में तो निजी कंपनियों की कुल प्रीमियम आय साल भर की समान अवधि की बनिस्बत 20.34 फीसदी घट गई है। अप्रैल-दिसंबर 2010 में जीवन बीमा कारोबार में लगी 23 निजी कंपनियों की कुल प्रीमियम आय 24,980.32 करोड़ रुपए थी। लेकिन अप्रैल-दिसंबर 2011 में यह 19,990.1 करोड़ रुपए पर आ गई है। इसी दौरान इकलौती सरकारी बीमा कंपनी, भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की भी कुल प्रीमियम आय 61,718.52 करोड़ रुपए से 15.66 फीसदी घटकर 52,053.44 करोड़ रुपए हो गई।

सभी जीवन बीमा कंपनियों को मिलाकर बात करें तो प्रीमियम आय में 17.01 फीसदी की कमी आई है। अप्रैल-दिसंबर 2010 में कुल प्रीमियम आय 86,698,85 करोड़ रुपए थी, जबकि अप्रैल-दिसंबर 2011 के दौरान यह 71,953.53 करोड़ रुपए पर आ गई। साल 2000 में बीमा कारोबार के उदारीकरण के बाद प्रीमियम आय में कमी पहली बार आई है। मुश्किल यह है कि उद्योग के लोग अपनी तरफ देखने के बजाय इसका दोष नियामक संस्था, इरडा में निकाल रहे हैं। उनका कहना है कि पिछले साल अक्टूबर से जिस तरह नियम कड़े किए गए हैं, उससे यूलिप (यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान) की बिक्री पर भारी नकारात्मक असर पड़ा है। कुछ दिनों पहले जीवन बीमा उद्योग के साझा मंच लाइफ इश्योरेंस काउंसिल के महासचिव और कभी एलआईसी के चेयरमैन रह चुके एस बी माथुर ने कहा था कि इधर बहुत कम यूलिप पॉलिसियां बिक रही हैं और लोगों को अब गारंटी वाले बीमा उत्पाद चाहिए।

लेकिन असली समस्या भरोसे के संकट की है जिसे निजी क्षेत्र दूर करने की कोई संजीदा कोशिश नहीं कर रहा। एलआईली ने अपनी परंपरागत साख बना रखी है। यही वजह है कि दिसंबर तक के नौ महीनों में उसकी एकल प्रीमियम वाली पॉलिसियों में भले ही कमी आई हो। लेकिन बराबर प्रीमियम देनेवाली पॉलिसियों की संख्या बढ़ी है और उनसे होनेवाली प्रीमियम आय भी। और, असल में सही पॉलिसियां यही होती हैं। एलआईसी की गैर-एकल प्रीमियम वाली पॉलिसियों की संख्या अप्रैल-दिसंबर 2010 के दौरान करीब 1.91 करोड़ थी और इनमें 15,795.92 करोड़ रुपए का प्रीमियम आया था। वहीं अप्रैल-दिसंबर 2011 में ऐसी पॉलिसियों की संख्या 7.4 फीसदी बढ़कर 2.04 करोड़ हो गई और इसमें कुल 17,142.19 करोड़ रुपए का प्रीमियम जमा हुआ जो साल भर से 8.5 फीसदी ज्यादा है।

साधारण बीमा की बात करें तो इस क्षेत्र में सक्रिय कुल 24 कंपनियों की प्रीमियम आय अप्रैल-दिसंबर 2011 के दौरान 24 फीसदी बढ़कर 42,023.35 करोड़ रुपए हो गई है। लेकिन इसमें 24.498.08 करोड़ रुपए यानी 58.3 फीसदी की योगदान छह सरकारी कंपनियों का है। इस दौरान निजी क्षेत्र की 18 साधारण बीमा कंपनियों की प्रीमियम आय 26.73 फीसदी बढ़ने के बावजूद 17,525.27 करोड़ रुपए पर पहुंची है, वहीं छह सरकारी कंपनियों की प्रीमियम आय 22.12 फीसदी बढ़कर 24498.08 करोड़ रुपए हो गई है।

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