अभी कैश, आगे डिलीवरी! चक्कर क्या है?

पूंजी बाजार नियामक संस्था, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने शनिवार 6 मार्च को अपनी बोर्ड बैठक में शेयर बाजार से जुड़ा एक अहम फैसला लिया है। वह यह कि उसने स्टॉक एक्सचेंजों को शेयरों के डेरिवेटिव सौदों में अभी की तरह कैश या नकद सेटलमेंट के साथ ही शेयरों की लेन-देन या फिजिकल सेटलमेंट की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। इसे कब तक लागू किया जाएगा, इसका फैसला स्टॉक एक्सचेंजों से बातचीत के बाद तय किया जाएगा। सेबी चेयरमैन सी बी भावे ने एक प्रेस कांफ्रेस में यह जानकारी दी।

असल में डेरिवेटिव सौदे और उसमें भी कैश या फिजिकल डिलीवरी का मसला काफी उलझा हुआ है। लेकिन इस समय बाजार की चाल इन्हीं सौदों से तय होती है क्योंकि कुल कारोबार का अधिकांश हिस्सा डेरिवेटिव सौदों (फ्चूयर व ऑप्शन) का होता है। आइए जानते हैं कि डेरिवेटिव सौदों होते क्या हैं और पूरा यह मामला है क्या?

डेरिवेटिव सौदे एक तरह के हेजिंग सौदे हैं जो अपने पास रखे किसी शेयर के बरक्स किए जाते हैं। मान लीजिए, निवेशक ने कैश बाजार से मौजूदा भाव पर किसी शेयर में एक लाख रुपए की खरीद कर ली। लेकिन उसे डर है कि कल को कहीं इस शेयर के भाव गिर गए तो उसे घाटा उठाना पड़ेगा। इससे बचने के लिए वह निफ्टी फ्यूचर्स में शॉर्ट सेल कर लेता है। मतलब निफ्टी फ्यूचर्स अभी के भाव से बेच देता है। कल को शेयर के भाव गिरते हैं तो निफ्टी फ्यूचर्स के भाव भी गिरेंगे। लेकिन चूंकि अभी उसने ज्यादा भाव पर ये फ्यूचर्स बेच रखे हैं, इसलिए उसे इनके अधिक भाव मिलेंगे, जिससे उसे शेयर के भाव में आई गिरावट की भरपाई हो जाएगी। बाजार की भाषा में इसे ही हेजिंग कहते हैं।

अगर निवेशक ने किसी शेयर के फ्यूचर खरीद रखे हैं और नियत समय पर उसके भाव खास स्तर से नीचे गिर जाते हैं, लेकिन वह घाटा नहीं खाना चाहता तो उसे उस शेयर की डिलीवरी मिलनी ही चाहिए। अभी डेरिवेटिव कारोबार की व्यवस्था यह है कि सेटलमेंट के दिन (बाजार में कयामत का दिन होता है क्योंकि इस दिन सारे लेन-देन, सौदों के सारे हिसाब-किताब निपटाए जाते हैं) डिलीवरी मांगने का कोई विकल्प ही नहीं है, भले ही भाव घटकर आधे रह गए हों। ऐसी सूरत में खरीदार को भाव का सारा अंतर नकद रकम देकर पूरा करना होता है। अतीत में फ्चूयर सौदों में जिस तरह भारी शॉर्ट सेलिंग होती रही है और जबरदस्त उतार-चढ़ाव या अस्थिरता देखी गई है, उसका एक कारण फिजिकल डिलीवरी के बजाय सौदे नकद में सेटल करने की मौजूदा व्यवस्था भी हो सकता है।

अभी कैश या स्पॉट बाजार इतना सूख चुका है कि सही निवेशक भी अपनी क्षमता के भीतर शेयर खरीदने का काम फ्यूचर सौदों के जरिए करना चाहेंगे, बशर्ते उन्हें इन शेयरों की फिजिकल डिलीवरी मिल जाए क्योंकि फ्यूचर सौदों में वोल्यूम भी होता है और लिक्विडिटी अच्छी होने के कारण सौदा फंसने का कोई झंझट नहीं होता। लेकिन कैश सेटलमेंट की मौजूदा व्यवस्था के कारण निवेशकों को मजबूरन सेटलमेंट के दिन नकद रकम देकर सौदे काटने होते हैं क्योंकि डिलीवरी लेने का कोई विकल्प है ही नहीं।

अब सेबी बोर्ड ने डेरिवेटिव सौदों में फिजिकल डिलीवरी की इजाजत देने का फैसला कर लिया है। लेकिन इस पर अमल स्टॉक एक्सचेंजों को करना है। आइए देखते हैं कि इस नई व्यवस्था का क्या असर पड़ेगा। एक तो शेयरों का कोई इंतजाम किए बगैर अभी जिस तरह की नैकेड शॉर्ट सेलिंग बाजार में जमकर होती है, वह रुक जाएगी। नतीजतन बाजार की वॉलैटेलिटी, अस्थिरता, चंचलता, चपलता या भारी घट-बढ़, जो भी इसे कह लें, काफी हद तक घट जाएगी और भारतीय पूंजी बाजार अंतरराष्ट्रीय बाजारों के बराबर आ जाएगा।

फिजिकल सेटलमेंट की सुविधा मिल जाने पर खरीदार सेटलमेंट के दिन डिलीवरी मांग सकता है , इसलिए जरूरत पड़ने पर शॉर्ट सेलर को या तो एसएलबी (स्टॉक लेंडिंग एंड बॉरोइंग) के जरिए संबंधित शेयर उधार लेने पड़ेंगे या उसे अनाप-शनाप शॉर्ट सेलिंग से ही तौबा करनी होगी। इससे कैश बाजार में डिलीवरी की मात्रा काफी ज्यादा बढ़ जाएगी।

निवेशक कैश में शेयर खरीदेंगे और फ्यूचर्स का ग्राहक अगर डिलीवरी पर जोर देता है तो वे सेटलमेंट के दिन अपने खरीदे गए शेयर उधार पर दे सकते हैं जिस पर उन्हें कमाई भी होती है। दूसरे ज्यादातर फ्यूचर सौदों से जुड़े कैश सौदे होने लगेंगे। इसलिए डेरिवेटिव सेगमेंट में ट्रेड होनेवाले शेयरों में बहुत ही अच्छा कारोबार होगा। इससे आर्बिट्रेज की गुंजाइश भी बढ़ जाएगी क्योंकि डिलीवरी के हिसाब से ग्राहक या विक्रेता के पक्ष में सौदे आगे ले जाने की लागत बदलती रहेगी।

इसका एक और फायदा यह होगा कि बाजार में अस्थिरता घटने से ज्यादा से ज्यादा निवेशक व कारोबारी इसमें शिरकत करेंगे। इससे कैश बाजार में कुल कारोबार या वोल्यूम बढ़ जाएगा। साथ ही इससे बाजार में कुछ हद तक जॉबरों की वापसी होगी क्योंकि कैश बाजार में हालात बेहतर होने व सुधार से सौदों में स्प्रेड का आकार घट जाएगा। बाजार के धंधे से जुडे लोगों के लिए आर्बिट्रेज जैसे अन्य रास्ते भी खुल जाएंगे। इससे बी ग्रुप के शेयरों का धंधा बढ़ेगा क्योंकि बाजार में शिरकत बढ़ने से बाजार का पूरा मूड और टेंपो बेहतर होता चला जाता है।

यकीकन सेबी का यह फैसला हमारे पूंजी बाजार की कुछ मौजूदा खामियों को दूर करेगा और इससे शेयर बाजार को सट्टेबाजी का अड्डा या जुआखाना समझने की आम सोच को बदलने में मदद मिलेगी।

अंत में सेबी बोर्ड के कुछ अन्य फैसले। 1 मई 2010 से क्यूआईबी समेत सभी संस्थागत निवेशकों को पब्लिक इश्यू (आईपीओ या एफपीओ) में पूरी रकम आवेदन के साथ ही देनी होगा। अभी तक आम निवेशकों को 100 फीसदी रकम आवेदन पर देनी होती थी, जबकि क्यूआईबी को केवल 10 फीसदी। इससे एएसबीए (अस्बा) का इस्तेमाल बढ़ सकता है। अभी 20-25 फीसदी आवेदन ही अस्बा के जरिए आते हैं।

कंपनियां अब अपने राइट्स या पब्लिक इश्यू में खुद से जुड़ी उन इकाइयों या सब्सिडियरियों के कर्मचारियों को भी कर्मचारी कोटे में शेयर दे सकती हैं जिनके समेकित या कंसोलिडेटेड नतीजे वह अपने वित्तीय परिणामों के साथ पेश करती है। सेबी ने स्टॉक एक्सचेंजों को यह भी इजाजत दे दी है कि वे शेयरों पर आधारित पांच साल के डेरिवेटिव सौदों की शुरुआत कर सकते हैं। अभी इस तरह के कांट्रैक्ट या सौदे ज्यादा से ज्यादा तीन साल के हो सकते हैं। इसके अलावा सेबी ने तय किया है कि पब्लिक इश्यू के बंद होने और स्टॉक एक्सचेंजों में उसकी लिस्टिंग के बीच का समय इस साल के अंत तक घटाकर एक हफ्ते पर ले आया जाएगा। अभी इसमें 20 दिन लगते हैं।

1 Comment

  1. इस ज्ञान वर्धक लेख के लिए आपका धन्यवाद। इस सरल भाषा में बाजार सुधारों के कार्यक्रमों की जानकारी हर किसी को नही मिलती पता नही मैं आपकी वेबसाइट तक कैसे पहूँच गया।

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