दुनिया की दो शीर्ष अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में से विश्व बैंक पर अमेरिका का कब्जा बरकरार है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) पर यूरोप का नेतृत्व है। लेकिन रेटिंग एजेंसियों के मामले में अमेरिका का ही बोलबोला है। स्टैंडर्ड एंड पुअर्स, मूडीज़ व फिच तीनों ही प्रमुख एजेंसियां अमेरिका की हैं। इनको चुनौती देने की कोशिश में यूरोप काफी समय से लगा हुआ है। लेकिन अभी तक यह कोशिश किसी अंजाम पर नहीं पहुंच सकी है।
असल में, जब रेटिंग एजेंसियां एक के बाद एक यूरोपीय देशों की रेटिंग कम कर रही थी, तब स्वतंत्र और कारगर यूरोपीय रेटिंग एजेंसी बनाने का विचार उपजा था। लेकिन उसके लिए निवेशक ही नहीं मिल रहे हैं। यूरोपीय रेटिंग एजेंसी बनाने का जिम्मा कंसल्टिंग फर्म रोलांड बर्गर को सौंपा गया था। लेकिन उसका कहना है कि 30 करोड़ यूरो की शुरुआती पूंजी जमा करने में उसे अब तक सफलता नहीं मिली है।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक उसका इरादा तीस निवेशकों से एक-एक करोड़ यूरो इकट्ठा करने का है। नई कंपनी अमेरिका की स्टैंडर्ड एंड पूअर्स, मूडीज और फिच जैसी रेटिंग एजेंसियों को चुनौती देती। लेकिन रोलांड बर्गर की एक प्रवक्ता का कहना है कि निवेशकों के साथ बातचीत जारी है। यूरोपीय बैंकों में इसके लिए दिलचस्पी तो है। लेकिन अब तक किसी ने वाजिब वित्तीय योगदान का आश्वासन नहीं दिया है। असल में योरपीय रेटिंग एजेंसी की कल्पना एक फाउंडेशन के रूप में की गई थी जिसका लक्ष्य मुनाफा कमाना नहीं था। इसमें निवेश के लिए वित्तीय संस्थाओं के बारे में सोचा गया था। सरकारी हिस्सेदारी की बात नहीं सोची गई थी।
अमेरिकी रेटिंग एजेंसियों पर आरोप है कि उन्होंने 2008 में दुनिया में वित्तीय संकट पैदा करने में योगदान दिया। उन पर यूरो संकट के दौरान बाजार पर अत्यधिक प्रभाव का भी आरोप है। वहीं, रोलांड बर्गर की परियोजना में अधिक पारदर्शिता है और उसका खर्च भी निवेशक खुद उठाएंगे। अमेरिकी रेटिंग एजेंसियों को उनसे धन मिलता है जिनकी रेटिंग की जाती है। यूरोपीय संघ ने रेटिंग एजेंसियों को कड़े नियंत्रण में डाल दिया है। इसकी जिम्मेदारी नियामक संस्था एसमा को दी गई है जिसका मुख्यालय पेरिस में है। इसके अलावा यूरोपीय आयोग ने तय किया है कि उद्यमों को नियमित रूप से एजेंसी बदलनी होगी ताकि हितों के टकराव की आशंका न रहे। रेटिंग एजेंसियां इसका विरोध कर रही हैं।
