वित्त सचिव से रिजर्व बैंक के गवर्नर बने शक्तिकांत दास ने छह साल तक मोदी सरकार के दास की तरह काम किया। 12 दिसंबर 2018 को उनके गवर्नर बनने के बाद से 31 मार्च 2024 तक सरकार ने रिजर्व बैंक के खजाने से ₹6.61 लाख करोड़ साफ कर दिए। 10 दिसंबर 2018 को दास का कार्यकाल खत्म होने के अगले दिन से रिजर्व बैंक का गवर्नर संजय मल्होत्रा को बना दिया गया। मल्होत्रा भी केंद्र सरकार में वित्त सचिव से एक पद नीचे राजस्व सचिव रहे हैं। उन्होंने इस पद पर बैठने के पहले ही साल में केंद्र सरकार को ₹2.69 लाख करोड़ का सरप्लस बतौर लाभांश देने का रिकॉर्ड बना डाला। इस तरह धीरे-धीरे रिजर्व बैंक मोदी सरकार के लिए सोने का अंडा देनेवाली मुर्गी बन गया है। यही नहीं, उसकी अब कोई स्वतंत्र नीति या सोच नहीं रह गई है। सरकार ने कहा कि ब्याज दर घटा दो तो उसने इस साल फरवरी से अब तक ब्याज दर 6.5% से घटाकर 5.5% कर दी। सिस्टम में नोटों की कमी नहीं, फिर भी सीआरआर घटाकर सिस्टम में ₹2.5 लाख करोड़ डालने का फैसला कर लिया। सरकार रिजर्व बैंक के इस रुख से गदगद है। इस बार बजट में रिजर्व बैंक और सरकारी बैंकों व वित्तीय संस्थाओं से कुल ₹2.56 लाख लाभांश पाने का प्रावधान है। लेकिन अकेले रिजर्व बैंक ने उसे ₹2.69 लाख करोड़ देकर और ज्यादा खर्चशाह बना दिया है। अब मंगलवार की दृष्टि…
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