किसी कंपनी के शेयरों में निवेश तभी फलता-फूलता है जब उसके धंधे में बरक्कत होती है। ऐसा किसी निर्वात में नहीं, बल्कि देश और उसकी बढ़ती अर्थव्यवस्था में होता है जिसकी खास कमान सरकार के हाथ में होती है। दिक्कत यह है कि सरकार इस समय सब्सिडी जैसे अनुत्पादक कामों को तवज्जो और शिक्षा, स्वास्थ्य व साफ-सफाई जैसे मदों की तौहीन कर रही है। उसे दरअसल सत्ता में बने रहने के लिए वोटों के जरिए जनता काऔरऔर भी

भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन प्रति व्यक्ति जीडीपी में दुनिया के 194 देशों में 144वें नंबर पर है। यह कैसा विकास है जिसमें निर्जीव आंकड़े है, लेकिन सजीव इंसान और उसके बाल-गोपाल गायब हैं? संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन (एफएओ) की एक रिपोर्ट कहती है कि 74.1% भारतीय स्वस्थ आहार जुटा पाने में असमर्थ हैं। विकास को मृत आंकड़ों से नहीं, जीवन के स्तर से नापा जाना चाहिए। हाथ में मोबाइलऔरऔर भी

आकांक्षा से भरे भारत के लिए 1947 तक देश को विकसित बनाने का सपना और मतपत्रों से सत्ता में बैठने का लाइसेंस पाने के लिए 81.35 करोड़ गरीबों को मुफ्त राशन। जिसे भी कोई गुरेज हो तो उसे सब्सिडी देकर चुप करा दो। वित्त वर्ष 2013-14 में सरकार ने खाद्य, खाद व ईंधन पर कुल 2,44,717 करोड़ रुपए की सब्सिडी दी थी। उसके बाद अच्छे दिन का नारा लेकर सत्ता में आई मोदी सरकार के शासन मेंऔरऔर भी

नारे फेंको, चुनाव जीतो और जनधन की लूट को बेरोकटोक जारी रखो। लगता है यही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मोटो बन गया है। हर भारतीय के बैंकखाते में 15 लाख रुपए को तो खुद मोटाभाई जुमला घोषित कर चुके हैं। 2022 तक किसानों की आय दोगुनी और हर साल दो करोड़ रोज़गार जैसे नारों व वादों की हकीकत जगजाहिर है। लेकिन डंके की चोट और मीडिया के नगाड़े की थाप पर बोलते हैं कि मोदी जो कहतेऔरऔर भी