रिस्क बहुत ज्यादा हो तो इंसान को निराशावादी हो जाना चाहिए और रिस्क काफी कम हो तो आशावादी। जबरदस्त रिस्क के माहौल में आशावाद हमारी नैया डुबा सकता है, जबकि निराशावाद से घिरे होने के कारण हम बहुत-बहुत फूंक-फूंककर सावधानी से चलेंगे तो बचने की गुंजाइश भरपूर रहेगी। वहीं, रिस्क बहुत कम हो तो आशावाद से लबालब होकर हम सुरक्षित फैसले ले सकते हैं, जबकि निराशावाद में डूबने पर अच्छे-खासे सुरक्षित मौके भी हमारे हाथ से निकलऔरऔर भी