अकेले शेयर बाज़ार में घबराहट होती तो संभल जाती। दिक्कत यह है कि सरकार तक घबराई हुई दिख रही है। लगता है कि उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। रिजर्व बैंक से 1.76 लाख करोड़ रुपए का सरप्लस खींचना और दस सरकारी बैंकों को मिलाकर चार बैंक बनाना यही संकेत देता है। जब चहुंओर आर्थिक सुस्ती का आलम हो और व्यापार-युद्ध के बीच वैश्विक अनिश्चितता बढ़ रही हो, तब इसका क्या औचित्य था! अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी