विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के रूप में आखिर किसका धन आकर भारतीय शेयर बाज़ार में लगता है? इस बार मई में, जब चुनावों की अनिश्चितता छाई हुई थी, तब ऐसे निवेशक क्यों चढ़े हुए बाज़ार में भी झूमकर धन लगा रहे थे? जाननेवाले सब जानते हैं। मॉरीशस जैसे रूट बंद हो जाने पर भी कालेधन का रास्ता बंद नहीं हुआ है। नहीं तो चुनावों में 60-70 हज़ार करोड़ का कालाधन कैसे लग जाता! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी