बंद है मुठ्ठी तो लाख की, खुल गई तो फिर खाक की। उंगली पर जब तक काली स्याही का निशान न लगे, तब तक सरकार में बैठी और उससे बाहर की पार्टियां उसकी कीमत लगा रही हैं। एक बार निशान लग गया, फिर पांच साल तक कौन पूछनेवाला! अभी गिनने को है कि 90 करोड़ मतदाता, जिसमें से 50 करोड़ युवा मतदाता और उसमें से भी 15 करोड़ ऐसे जिन्होंने पिछले पांच सालों में मतदाता बनने काऔरऔर भी

भारत में उद्यमशीलता की कोई कमी नहीं। हमारे नगरों-महानगरों की छोटी-छोटी गलियों में आपको इसकी झलक मिल जाती है। न जाने कितने चरणों में अपना माल बनवाकर छोटी कंपनियां बडे ग्राहकों तक पहुंचाती हैं। यही छोटी कंपनियां एक दिन बड़ी बन जाती हैं तो उनके मूल्य का कोई ठिकाना नहीं रहता। हम आज तथास्तु में ऐसी ही एक छोटी से बड़ी बनी कंपनी लेकर आए हैं जिसने आठ साल में आठ गुना से ज्यादा रिटर्न दिया है…औरऔर भी

केंद्र में जनवरी 1980 से अक्टूबर 1984 तक इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की बहुमत सरकार थी। उस दौरान देश के जीडीपी की औसत विकास दर 5.9% थी। फिर नवंबर 1984 से दिसंबर 1989 तक राजीव गांधी की शानदार बहुमत वाली सरकार थी। हमारी अर्थव्यवस्था उन पांच सालों में औसतन 5.4% की सालाना दर से बढ़ी। जुलाई 1991 से मई 1996 तक नरसिम्हा राव की सरकार में औसत विकास दर 5.2% रही। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

केंद्र में एकदलीय सरकार हो या गठबंधन सरकार, 1980 के बाद अब तक के 39 सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था औसतन 6.3% सालाना की दर से बढ़ती रही है। इसमें मुद्रास्फीति का प्रभाव हटा दिया गया है। अगर उसका प्रभाव जोड़ दें तो हमारे जीडीपी की सालाना विकास दर लगभग 13% हो जाती है। इस 39 सालों में केंद्र में दस सरकारें रहीं जिनमें से केवल तीन सरकारें एक दल के बहुमत की थीं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

चुनावों के नतीजे यकीनन दो-चार, दस-पंद्रह दिन शेयर बाज़ार पर असर दिखाते हैं। लेकिन बाद में सब सामान्य हो जाता है। विदेशी निवेशकों के आने पर फर्क नहीं पड़ता, न ही घरेलू निवेशकों का जोश कमबेशी होता है। लंबे समय में भारत की विकासगाथा का दमखम बरकरार है तो शेयर बाज़ार तरन्नुम में उड़ता रहता है। केंद्र में एक दलीय बहुमत की सरकार हो या गठबंधन की सरकार हो, बाज़ार चहकता रहता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी