शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग बहुत रिस्की बिजनेस है। खासकर, रिटेल ट्रेडरों के लिए तो बहुत ही ज्यादा। यहां बड़े-बड़े मगरमच्छ घात लगाए बैठे हैं जो जोश में उछलते-कूदते नौसिखिया ट्रेडरों को फौरन निगल जाते हैं। ट्रेडिंग के रिस्की बिजनेस में जो जहां तक रिस्क को संभाल पाता है, वहां तक कमाता है। यहां से कमाने का यही मूलमंत्र है। जो रिस्क की परवाह नहीं करता, वो यहां अपनी सारी पूंजी डुबा डालता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में नई-नई दिलचस्पी जगे और दो-चार दिन टॉप-गेनर्स की लिस्ट देखें तो मन में लालच जग उठता है कि हर दिन 2% भी कमाए तो महीने भर का 40% और साल का 480% हो जाएगा। ट्रेडिंग से अपना धन साल भर में लगभग पांच गुना! मौजा ही मौजा!! लालच का सुरूर ऐसा कि दिखता ही नहीं कि इतनी कमाई में कितना भयानक रिस्क है। इतना रिस्क कि सारी-की-सारी पूंजी डूब जाए। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अमीर का अमीर और गरीब का गरीब होते जाना समाज के लिए अच्छा नहीं। लेकिन अपने यहां शेयर बाज़ार तक में यही हो रहा है। 1 जनवरी 2018 से 8 फरवरी 2019 तक बीएसई सेंसेक्स 8.08% बढ़ा है, जबकि मिडकैप सूचकांक 18.52% और स्मॉलकैप सूचकांक 28.53% गिरा है। बड़ों को पुचकारना और छोटों को दुत्कारना अच्छा नहीं। हालांकि इससे छोटी मजबूत कंपनियों को पकड़ने का अच्छा मौका मिल गया है। आज तथास्तु में ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी

सरकार अगर वाकई कुछ करना चाहती तो वह केंद्र और राज्य सरकारों में इस समय खाली 24 लाख से ज्यादा पदों को फौरन भरने का इंतज़ाम कर देती। लेकिन उसने एनएसएसओ की वह रिपोर्ट ही दबा दी जिसमें खुलासा हुआ कि 2017-18 में देश में बेरोजगारी की दर 45 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। दिक्कत यह है कि मोदी सरकार को ठोस काम के बजाय नए-नए जुमलों पर ज्यादा यकीन है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

पीयूष गोयल कहते हैं कि बजट में संख्याओं से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है क्योंकि प्रधानमंत्री ईमानदार बजट चाहते थे। लेकिन जानकार बताते हैं कि इसमें इतनी बेईमानी बरती गई है कि यह बजट नहीं, फजट बन गया है। आईडीबीआई के लिए एलआईसी से वसूले गए 65,000 करोड़ को छोड़ दें, केवल एफसीआई की 1.40 लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी को जोड़ दे तो राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4% हो जाता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी