लंबा निवेश कला है और विज्ञान भी
इस समय 400 से ज्यादा स्मॉल-कैप कंपनियों के शेयर 52 हफ्तों की तलहटी पकड़ चुके हैं। इसमें बहुत-सी अच्छी व मजबूत कंपनियां हैं। आठ साल पहले 2011 में भी ऐसी ही स्थिति आई थी। लेकिन उनके शेयर तेज़ी से उठे थे। इस बार भी देर-सबेर ऐसा होना है क्योंकि लंबे समय में शेयरों के भाव कंपनियों के धंधे के अनुरूप चलते हैं। यह विज्ञान है, जबकि उन्हें चुनना एक कला है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी
और भी हैं तरीके जोखिम संभालने के
स्टॉप-लॉस के अलावा शेयर बाजार की ट्रेडिंग के रिस्क को संभालने के और भी तरीके हैं। मसलन, पूरी ट्रेडिंग पूंजी को बीस या उससे ज्यादा हिस्से में बांट लें और एक ट्रेड में केवल एक हिस्सा लगाएं। इसे पोजिशन साइजिंग कहते हैं। अन्य नियम है कि एक सौदे में 2% और महीने में 6% स्टॉप-लॉस लग जाए तो मन बेचैन हो जाता है। ऐसे में फौरन उस महीने भर ट्रेडिंग रोक देनी चाहिए। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी
रिस्क में दोस्त बन बचाए स्टॉप-लॉस
स्टॉप-लॉस ट्रेडिंग के बिजनेस की लागत ही नहीं है, बल्कि वह इस बिजनेस में आपके समझदार दोस्त का भी काम करता है। बल्कि, जब आप रिस्क में फंसते हो तो स्टॉप-लॉस सबसे अच्छे दोस्त की तरह आपको उबार लेता है। इसलिए स्टॉप-लॉस हमेशा सौदा करने से पहले स्टॉक के स्वभाव और अपने रिस्क प्रोफाइल पर विचार के बाद तय कर लेना चाहिए। फिर बिना कई ढील दिए कड़ाई से उसका पालन करना चाहिए। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी
बिजनेस की लागत तो सभी चुकाते हैं
शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में उतरनेवाले कुछ लोग खुद को बड़ा तीसमार-खां समझते हैं। वे स्टॉप-लॉस लगाने की जहमत नहीं उठाते। भूल जाते हैं कि शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग भी एक बिजनेस है और हर बिजनेस की कुछ न कुछ लागत होती है। स्टॉप-लॉस शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग के बिजनेस की लागत है जिसे चुकाने से कोई भी नहीं बच सकता। बराबर बढ़ता शेयर अचानक झटका खाने पर सारी पूंजी सोख लेता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी







