शेयर बाज़ार के स्वभाव को समझनेवाले ट्रेडिंग से भरपूर कमा लेते हैं, बशर्ते उनके पास पर्याप्त पूंजी हो। मेरा एक राजस्थानी मित्र है। शांत स्वभाव। शिक्षा से इंजीनियर, पेश से ट्रेडर। बीस लाख रुपए की पूंजी। हर महीने बाज़ार से औसतन पांच-दस प्रतिशत (एक से दो लाख रुपए) कमा लेता है। सपरिवार मजे में रहता है। अभी-अभी सिंगापुर से दस दिन की छुट्टियां मनाकर लौटा है। इंट्रा-डे नहीं, स्विंग ट्रेडिंग ही करता है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

शेयर बाज़ार हर पल, ठीक उस पल तक उपलब्ध सारी सूचनाओं को दर्शाता है। लेकिन वो बड़ा टेढ़ा-मेढ़ा आईना है जो सूचनाओं के तर्क व विवेकसंगत प्रभाव को नहीं, बल्कि उन्हें काफी कम या बहुत ज्यादा करके दिखाता है। बाज़ार आमतौर पर बुरी खबरों को ज्यादा ही रोता है, जबकि अच्छी खबरों पर बहुत ज्यादा आशावादी हो जाता है। वह अक्सर किसी पागल या हमारे मन के पागलपन की तरह बर्ताव करता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

आमतौर पर लंबे समय का निवेश बहुत बोरिंग होता है। उसमें अचंभे या थ्रिल जैसी कोई चीज़ नहीं। वहीं, ट्रेडिंग में अचंभा ही अचंभा होता है। वहां पल-पल का थ्रिल है। यही वजह है कि बहुत से लोग नफे-नुकसान की परवाह किए बगैर इस थ्रिल के आदी हो जाते हैं। यह अलग बात है कि आखिरकार सब कुछ लुटाकर ड्रग एडिक्ट की तरह कहीं के नहीं रहते। हमें इस एडिक्शन से बचना चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

निवेशक कंपनी की मूलभूत मजबूती व लाभप्रदता के दम पर दौलत बनाने के लिए रिस्क लेता है, जबकि ट्रेडर कंपनी के शेयरों की गति, लहरों के उसके स्वभाव पर दांव लगाकर कमाता है। दोनों ही रिस्क लेते हैं। निवेशक का रिस्क ज्यादा नहीं होता, जबकि ट्रेडर जमकर रिस्क लेता है। कम रिस्क तो कम रिटर्न और ज्यादा रिस्क तो ज्यादा रिटर्न। यह शाश्वत नियम बाज़ार में काम करता है। कोई इससे ऊपर नहीं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी