हमारी मान्यताएं आमतौर पर अतार्किक व नकारात्मक होती हैं। वे तथ्यों से मेल नहीं खातीं। फिर भी हम उनसे चुम्बक की तरह चिपके रहते हैं क्योंकि वे हमारे अवचेतन मन में गहरी पैठ बना चुकी होती हैं। हमारा सचेतन मन कितनी भी कोशिश कर ले, फैसला लेते वक्त अवचेतन मन ही निर्णायक साबित होता है। हम खूब सारी किताबें पढ़ते हैं, नए-नए लेख पढ़ते हैं। लेकिन मौका पड़ने पर कुछ काम नहीं आता। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी