हम अपनी मान्यताओं के प्रतिकूल पड़नेवाले अनुभवों को ठुकराते और अनुकूल पड़नेवाले अनुभवों को स्वीकार करते जाते हैं। धीरे-धीरे मान्यताएं हमारी ऐसी प्रोग्रामिंग व कंडीशनिंग कर देती हैं कि हम दुनिया को खुली आंखों से देखने के बावजूद उन्हें मान्यताओं की नज़र से समझने लगते हैं। सच्चाई दूर खड़ी हमारा मुंह चिढ़ाती रहती है और हम समझ ही नहीं पाते कि हम हर काम में बराबर नाकाम क्यों होते जा रहे हैं। अब आजमाएं बुध की बुद्धि…औरऔर भी