कमोबेश सभी विशेषज्ञ मानते हैं कि साल 2018 में शेयर बाज़ार पिछले कुछ सालों जितना तेज़ नहीं रहने जा रहा। एक वजह तो यह है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक अब शेयरों से ज्यादा सरकारी या कॉरपोरेट ऋण को अहमियत देने लगे हैं। दूसरी वजह है कि मार्च से राज्यों के चुनावों का जो सिलसिला शुरू हो रहा है, वह राजनीतिक उहापोह पैदा कर सकता है। तीसरे, मोदी सरकार कठोर आर्थिक फैसलों से बचेगी। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी