80-85% भारतीयों के पास ज़रूरी खर्चों को पूरा करने के बाद इतना नहीं बचता कि भविष्य के लिए अलग से बचा सकें। इसीलिए बीमा व पेंशन जैसी सरकारी स्कीमों के ज़रिए सामाजिक सुरक्षा की बड़ी ज़रूरत है। फिर भी निवेश की इस धारणा पर हमें सोचना चाहिए कि खर्च के बाद जो बचे, उसे बचाने के बजाय, बचाने के बाद जो बचे, उसे ही खर्च करना चाहिए। अब तथास्तु में बचत को दौलत बना सकनेवाली एक कंपनी…औरऔर भी

बहुतेरे ट्रेडर अफसोस करते हैं कि उतने भाव पर खरीदा या बेचा होता तो फायदे में रहता। इसी सोच में दिवास्वप्न देखते रहते हैं। भूल जाते हैं कि ट्रेडिंग से कमाई का असली सूत्र सही एंट्री या निकलने के बजाय सौदे का सही आकार है। सौदे का आकार इतना हो कि उसके उल्टा पड़ने की बेचैनी दिन-रात न सताए। एक सौदा ज्यादा से ज्यादा 0.5-1% ट्रेडिंग पूंजी ही डुबाए। बाकी तो प्रायिकता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बाज़ार को पकड़ना किसी के लिए संभव नहीं। अकेले भावों से उसकी थाह लगाना तो एकदम मुमकिन नहीं क्योंकि भाव तो छाया हैं और छाया से काया को नहीं पकड़ा जा सकता। असल में भाव बहुत सारे कारकों से मिलकर बनते हैं। इन कारकों को ध्यान में रखते हुए उनकी भावी चाल का अंदाज़ भर लगाया जा सकता है। यहां पक्का कुछ नहीं, केवल प्रायिकता या संभावना ही निकाली जा सकती है। अब पकड़ें गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में घातक धारणा फैली हुई है कि भाव ही भगवान है। कुछ लोग सारी टेक्निकल एनालिसिस को छोड़कर दावा करते हैं कि केवल भावों के आधार पर बाज़ार को पकड़ा जा सकता है। लोगों को लगता है कि वाह! कितना आसान है। खाली भाव देखना सीख लो तो कमाई ही कमाई होने लगेगी। वे सीखने के चक्कर में दस-बीस हज़ार गंवा देते हैं। लेकिन कमाई में ठन-ठन गोपाल बने रहते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

युद्ध के मैदान में कोई सोचे कि हम ही हम हैं, दूसरा नहीं तो पलक झपकते ही कोई उसे खत्म कर सकता है। लेकिन शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में अक्सर छोटे ही नहीं, बड़े शहरों के सामान्य लोग इसी अहंकार के साथ उतरते हैं। उनको लगता है कि उन्होंने जैसा सोचा है, वैसा ही होगा। पहले छोटा घाटा, उसे निकालने के चक्कर में बड़ा घाटा और फिर खल्लास। आखिरकार, मामू वापस दुकान पर। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी