ट्रेडिंग में भावना या मन के निषेध के लिए पहले हमें अपने मनोविज्ञान को समझना होगा। जैसे, हाथ में आया मुनाफा हम जाने नहीं देना चाहते। मानने को तैयार नहीं होते कि हमारा कोई फैसला घाटा बढ़ाने का सबब बन जाएगा। स्टॉप-लॉस को ऊपर उठाने के बजाय बीच में ही मुनाफा काट लेते हैं। वहीं, उल्टे पड़े सौदे में स्टॉप-लॉस गिराते जाते हैं और घाटे के दलदल में समूची पूंजी डुबा डालते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

जिस किसी को शेयर या अन्य वित्तीय बाज़ारों में ट्रेडिंग से कमाना है, उसे ऐसा सिस्टम बनाना चाहिए, बहुत सारे कारकों के मद्देनज़र ऐसी व्यूह-रचना करनी होगी कि मन लाख कोशिशों के बावजूद उसमें घुस ही न पाए। पक्का समझिए कि मन उसमें घुस गया तो सारा खेल भरभंड कर देगा और आप हार जाएंगे। सिस्टम में क्या नियम रखे जाने हैं, इसके किताबों के साथ ही अपने अनुभव से सीखना होता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

समग्र आकलन जितना वस्तुगत व निरपेक्ष होगा, उतनी ही अधिक उसके सही बैठने की प्रायिकता होती है। यह प्रायिकता 70-80% हो तो क्या कहने! लेकिन प्रायः हम कभी वस्तुगत आकलन कर ही नहीं पाते हैं। इसकी एक वजह तो यह है कि सारे कारकों का पता-ठिकाना हमें मालूम नहीं होता। दूसरे, आकलन में हम आत्मगत पहलू या अपने मन की बात घुसेड़ देते हैं। ऐसे में प्रायिकता में बट्टा लग जाता है। अब आजमाएं बुध की बुद्धि…औरऔर भी

बाज़ार में पक्का कुछ नहीं होता। फिर भी राह निकालने के लिए अपनी तरफ से मशक्कत करनी पड़ती है। रात बीतने ही पिछले भाव अतीत बन जाते हैं। इसके बावजूद ट्रेडर उनके पैटर्न से आगे का अनुमान लगाते हैं। यह अनुमान गणित व सांख्यिकी के मेल से भी निकाला जा सकता है और भावों के चार्ट पर बनती आकृतियों से भी। जिसको जो भाए, उसको उस तरीके से भावी आकलन करना होता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बाज़ार की अगली चाल कौन-सी चीज़ें तय करती हैं? उसमें जितने भी लोग सक्रिय हैं चाहे वो देशी या विदेशी संस्थाएं हों या एचएनआई निवेशक और भेड़चाल चलते रिटेल निवेशक, इन में सभी की हरेक हरकत का मेल। इसके ऊपर इन लाखों शक्तियों के भिन्न क्रम और मेल का असर। जैसे, लाखों वनस्पतियां जंगल के स्वभाव का निर्धारण करती हैं। फिर भी हम जंगल से पार पाने की जुगत निकालते हैं। अब पकड़ते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी