जो प्रोफेशनल ट्रेडर हैं या किसी बैंक, बीमा कंपनी, म्यूचुअल फंड या वित्तीय संस्था से जुड़कर ट्रेडिंग करते हैं, उन्हें छोड दें तो बाकी लोग वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग को फटाफट नोट छापने का ज़रिया मानते हैं। यह सोच सरासर गलत है। अरे भाई! नोट केवल किसी देश का केंद्रीय बैंक, जैसे अपना रिजर्व बैंक की छाप सकता है। हमारे जैसे सामान्य लोग कठिन मेहनत और मशक्कत से ही नोट बना सकते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

हीरे की परख के लिए अच्छा जौहरी चाहिए। लेकिन शेयर बाज़ार में लिस्टेड अच्छी कंपनी की पहचान हर कोई कर सकता है, बशर्ते वो दो खास तथ्यों का पता लगाना सीख जाए। पहला यह कि कंपनी का कैश-फ्लो कितना अच्छा है। कैश-फ्लो शुद्ध लाभ से वर्किंग कैपिटल और नए पूंजी निवेश को घटाने के बाद निकलता है। दूसरा यह कि कंपनी अपनी पूंजी की लागत से कितना ज्यादा कमा रही है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

हम रिटेल ट्रेडर हैं। लेकिन जब तक हम प्रोफेशनल ट्रेडर की तरह सोचते व काम नहीं करते, तब तक बाज़ार से कमा नहीं सकते। दिक्कत यह है कि हम बैंक या म्यूचुअल फंड नहीं हैं। हमारी पूंजी और समय सीमित है। ऐसे में हमें हर तरफ मुंह मारने के बजाय अपने माफिक स्टॉक्स चुनने पड़ते हैं। उनका स्वभाव समझकर ट्रेड करना होता है। ध्यान रखें, ट्रेडिंग का कोई सामूहिक सूत्र नहीं हो सकता। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हम में से हर किसी का व्यक्तित्व थोड़ा-बहुत अलग होता है। हमारी पसंद-नापसंद भी भिन्न होती है। दुकान में हज़ारों शर्ट होती हैं, लेकिन हमें कुछ ही पसंद आती हैं। इसी तरह बाज़ार के खिलाड़ियों का रुझान अलग-अलग शेयरों की तरफ होता है। उनके जुड़ने के चलते हर शेयर का अपना अलग स्वभाव बन जाता है। कोई धीमी गति से चलता है तो कोई बहुत तेज़ उछलता है। सबके ट्रिगर अलग होते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

जैसे-जैसे हम शेयरों की चाल के पीछे के इंसानों को देखने की दृष्टि हासिल करते जाते हैं, वैसे-वैसे सारा खेल हमारे सामने खुलता जाता है। तब तक हम अंधेरे में ही तीर मारते रहते हैं। दरअसल, शेयर बाज़ार की सारी शिक्षा-दीक्षा का मतलब ही यह है कि उसमें सक्रिय लोगों की श्रेणियों की पहचान कर ली जाए। रिटेल निवेशक भेड़चाल चलते हैं जबकि प्रोफेशनल ट्रेडरों व संस्थाओं की मुठ्ठी में रहता है बाज़ार। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी