बाज़ार निरा पागल, तर्क करना बेकार
2015-08-03
बाज़ार अगर इंसान होता तो निरा पागल होता। इसके साथ कुछ असाध्य मानसिक समस्याएं हैं। कभी भयंकर उछलकूद मचाता है और शेयरों के भाव सातवें आसमान पर पहुंच जाते हैं तो कभी निराशा में ऐसा डूबता है कि लाख कोशिशों के बावजूद उठने का नाम नहीं देता। सरकार भी उसके आगे थक जाती है। वित्तीय बाज़ार हम जैसे लोगों से ही बनता है, लेकिन उसका सामूहिक व्यक्तित्व तर्कों से परे चला जाता है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

