मान्यता है कि भारतीय बाज़ार का रुख विदेशी निवेशक संस्थाएं तय करती हैं। हो सकता है कि लंबे समय का सच यही हो। लेकिन फिलहाल तो लगता है कि देशी निवेशक संस्थाएं बाज़ार का रुख तय करने लगी हैं। जून महीने में अब तक हर दिन उन्होंने कैश सेगमेंट में शुद्ध खरीद की। इस दौरान विदेशी संस्थाओं की भारी बिकवाली के बावजूद बाज़ार बढ़ा है। देखते हैं, यह रुख कितना टिकता है। चलिए, करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

शेयरों के भाव कभी सीधी रेखा में नहीं, बल्कि लहरों जैसे चलते है। इन लहरों पर अच्छी सवारी गांठनेवाले लोग कमाते हैं, वहीं बिना सोचे-समझे लहरों पर कूदनेवाले डूब जाते हैं। एक और अकाट्य सच है कि भले ही ट्रेडिंग से कंपनियों के शेयरों के भावों की खोज होती है, लेकिन ट्रेडरों के लिहाज से इसमें दरअसल भावुक लोगों की जेब से धन निकलकर बुद्धिमान लोगों की जेब में जाता है, ज़ीरो-सम गेम। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

पक्के ट्रेडरों के बीच में मान्यता है कि हर निवेशक मूलतः ट्रेडर होता है और ट्रेडिंग में फंस जाने पर मजबूरी में दीर्घकालिक निवेशक बन जाता है। लेकिन असलियत ऐसी नहीं। निवेश और ट्रेडिंग के मूलभूत सिद्धांत अलग हैं। दीगर बात है कि सुसंगत निवेश का समय घटकर अब दो साल और कुशल ट्रेडिंग इंट्रा-डे से निकल हफ्ते-दस दिन या एक-दो महीने की हो गई है। हमें यह बदलाव समझना चाहिए। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

सफलता सरलता से पाई जाती है। अगर कामयाबी के चक्कर में जटिलता में उलझे हैं तो थोड़ा ठहरकर सोचिए कि कहीं आप कुछ गलत तो नहीं कर रहे। एक छोटी-सी मिसाल। कल हमने बाज़ार खुलने के पहले बेहद सरल गणनाओं से निकाला कि निफ्टी का संभावित दायरा 7945 से 8055 तक रह सकता है और वास्तविक रेंज 7944.85 से 8057.70 की रही। खैर, इसका मतलब यह नहीं कि सब पहले से तय है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

ग्रीस का ऋण संकट। अमेरिका में ब्याज दर बढ़ने का अंदेशा; इस पर इसी हफ्ते फेडरल रिजर्व अपनी बैठक के बाद बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगा। घर के बादलों पर बाहर की अनिश्चितता की घटा। हालांकि मई में रिटेल मुद्रास्फीति के बढ़ने की चिंता पर अप्रैल में औद्योगिक उत्पादन बढ़ने का उत्साह ज्यादा है। मगर बाज़ार की चाल को जितने कारक प्रभावित करते हैं, उन सभी को कोई नहीं पकड़ सकता। अब देखते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी