छासठ साल कम नहीं होते बंद गांठों को खोलने के लिए। लेकिन नीयत ही न हो, सिर्फ साधना का स्वांग चल रहा हो तो कुंडलिनी मूलाधार में ही कहीं सोई पड़ी रहती है। आज़ादी के बाद देश की उद्यमशीलता को जिस तरह खिलना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ। सच कहें तो सायास ऐसा होने नहीं दिया गया। उद्योगों को मंदिर मानने, हाइब्रिड बीजों से आई हरित क्रांति और अर्थव्यवस्था को खोलने के पीछे बराबर एक पराश्रयी सोचऔरऔर भी

बाज़ार को लेकर हर किसी की अपनी-अपनी धारणा है, स्टाइल है। जैसे कुछ लोग कहां पर एंट्री मारनी है, इसको खास तरजीह ही नहीं देते। उनका कहना है कि ट्रेडिंग में एंट्री निश्चित रूप में महत्वपूर्ण है, लेकिन सबसे कम। अहम बिंदु वो है जब कोई स्टॉक ट्रेंड बदल रहा हो क्योंकि इस मोड़ पर रिस्क और रिवॉर्ड का अनुपात सबसे बेहतर होता है। जोखिम कम से कम और रिटर्न ज्यादा से ज्यादा। अब, मंगल की ग्रहदशा…औरऔर भी