नाफेड के लिए 1200 करोड़ रुपए के राहत पैकेज को शायद अभी अमली जामा नहीं पहनाया जा सके क्योंकि कृषि मंत्रालय को इसके चेयरमैन पद पर बिजेंदर सिंह के बने रहने पर आपत्ति है। सिंह पर वित्तीय अनियमितताओं में शामिल होने के आरोप हैं। पहले तय हुआ था कि सरकार 51 फीसदी हिस्सेदारी के बदले नाफेड को 1200 करोड़ रुपए का राहत पैकेज दे सकती है। मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक सिंह को निजी फर्मों को 4000औरऔर भी

केंद्र सरकार ने निर्यात को बढ़ावा देने की डीईपीबी (ड्यूटी इनटाइटलमेंट पास बुक) समेत तमाम स्कीमों की अवधि छह महीने से लेकर एक साल तक आगे बढ़ा दी है। सोमवार को वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने चालू वित्त वर्ष 2010-11 की व्यापार नीति की घोषणा करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक हालात अब भी सामान्य नहीं हुए हैं। इसलिए निर्यात संबंधी प्रोत्साहन को जारी रखना जरूरी है। सरकार के इस फैसले से उस पर इस साल 1052औरऔर भी

सही स्टॉक, सही वक्त और सही ट्रिगर – ये तीन सही चीजें किसी भी शेयर की चाल के लिए बाजार के तीन तिलंगों से भी बेहतर संयोग का काम करती हैं। आईटीआई आज 10.7 फीसदी बढ़कर 46 रुपए पर पहुंच गया और बंद हुआ 5.42 फीसदी की बढ़त के साथ 43.80 रुपए पर। इस्पात इंडस्ट्रीज में तकरीबन छह महीनों से हम पूरे धैर्य के साथ इंतजार कर रहे थे और अब अंततः इस स्टॉक से सहवाग जैसीऔरऔर भी

खबरें अक्सर किसी शेयर को तात्कालिक आवेग देने का काम करती हैं। कभी-कभी यह भी होता है कि खबर को पहले ही बाजार डिस्काउंट करके चलता है तो उसके उजागर होने के फौरन बाद उसका असर नहीं होता। ऐसी ही खबर पिछले हफ्ते बाजार बंद होने के एक दिन बाद शनिवार को आई है सरकारी कंपनी आईटीआई लिमिटेड के बारे में। एक सरकारी अधिकारी के हवाले बताया गया कि आईटीआई में निर्णायक हिस्सेदारी देने के लिए नएऔरऔर भी

आकर्षण तभी तक है जब तक हम में नया कुछ रचने की क्षमता है। स्थूल रूप में देखें तो सृजन की क्षमता खत्म होते ही चेहरे और शरीर की रौनक चली जाती है। सृजन और सामाजिक स्वीकृति में भी यही रिश्ता है।और भीऔर भी

इधर बॉम्बे डाईंग से लेकर रेमंड, सेंचुरी टेक्सटाइल, आलोक इंडस्ट्रीज और प्रोवोग जैसी कई टेक्सटाइल कंपनियों की जमीन का हिसाब-किताब निकाला जा रहा है और पंटर भाई लोग मान रहे हैं कि जमीन से इन कंपनियों में छिपा हुआ मूल्य निकलकर सामने आएगा और इनके शेयर नई पेंग भरेंगे। पिछले दिनों इनके शेयर बढ़े भी हैं। इसलिए नहीं कि उनके मूल व्यवसाय में कोई शानदार चीज हो गई है, बल्कि इसलिए कि इनके पास काफी जमीन हैऔरऔर भी

12वीं सदी की शुरुआत में मध्य एशिया से आने वाले लोग भारत में बसने लगे थे। वे अपने साथ चर्खा और कागज भी लाए जिसके बाद जिंदगी, तहज़ीब और ज़बान ने एक नया रंग अख्तियार करना शुरू कर दिया। जो फौजी आते थे, वे साथ लाते थे अपनी जबान खाने पीने की आदतें और संगीत। वे यहां के लोगों से अपने इलाके की जबान में बात करते थे जो यहां की पंजाबी, हरियाणवी और खड़ी बोली सेऔरऔर भी

हम क्या हैं? अपने शरीर से किस तरह भिन्न हैं? मुझे तो लगता है कि हम इस शरीर के इन-बिल्ट ड्राइवर हैं। और, अच्छा ड्राइवर वही है जो गाड़ी की मेंटेनेंस के साथ-साथ उसे पूरी तरह कंट्रोल में रखना जानता है।और भीऔर भी

laxmi and begum

आपने भी देखा होगा। मैंने भी देखा है। सड़क के किनारे, गली के नुक्कड़ पर, बस अड्डों के पास, ट्रेन के डिब्बों में कभी-कभी एक आदमी नीचे बैठा ताश के छह पत्तों को उल्टी तरफ से दो-दो की जोडियों में खटाखट तीन सेट में रखता जाता है। आसपास कम से कम तीन लोग खड़े रहते हैं जो उसे घेरकर दांव लगाते हैं। दांव यह होता है कि जिसके बताए पत्ते के पलटने पर बेगम निकलेगी, उसके सौऔरऔर भी

धरती गोल है। लगती है चौरस। इस तीन आयामी दुनिया में सब कुछ ऐसा ही लगता है। लेकिन जो लगता है, वही सच नहीं होता। सच तक पहुंचने के लिए चौथी विमा या आयाम यानी समय को फ्रेम में लाना जरूरी है।और भीऔर भी